फाग लागि की छट तिथी जसुदा लियौ अवतार, बाजत आजुं बधाई

वृन्दावन, 07 फरवरी 2018, (VT) यशोदा को पौराणिक ग्रंथों में नंद की पत्नी कहा गया है। ’’भागवत पुराण’’ में यह कहा गया है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म देवकी के गर्भ से मथुरा के राजा कंस के कारागार में हुआ था। कंस से रक्षा करने के लिए जब वासुदेव जन्म के बाद आधी रात में ही उन्हें यशोदा के घर गोकुल में छोड़ आए तो उनका पालन पोषण यशोदा ने किया। भारत के प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में बालक कृष्ण की लीलाओं के अनेक वर्णन मिलते हैं, जिनमें यशोदा को ब्रह्मांड के दर्शन, माखनचोरी और उसके आरोप में ऊखल से बाँध देने की घटनाओं का सूरदास ने सजीव वर्णन किया है।
यशोदा ने बलराम के पालन पोषण की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो रोहिणी के पुत्र और सुभद्रा के भाई थे। उनकी एक पुत्री का भी वर्णन मिलता है, जिसका नाम ’’एकांगा’’ था। परिचय मुक्तिदाता भगवान से जो कृपाप्रसाद नन्दरानी यशोदा मैया को मिला, वैसा न ब्रह्मा को, न शंकर को, न अर्धागिनी लक्ष्मी जी को ही कभी प्राप्त हुआ। वसुश्रेष्ठ द्रोण ने पद्मयोनि ब्रह्मा से यह प्रार्थना की- ’’देव! जब मैं पृथ्वी पर जन्म धारण करूं, तब विश्वेश्वर स्वयं भगवान श्रीहरि श्रीकृष्णचन्द्र में मेरी परम भक्ति हो।’’
इस प्रार्थना के समय द्रोणपत्नी धरा भी वहीं खड़ी थीं। धरा ने मुख से कुछ नहीं कहाय पर उनके अणु-अणु में भी यही अभिलाषा थी, मन-ही-मन धरा भी पद्मयोनि से यही मांग रही थीं। पद्मयोनि ने कहा- ’’तथास्तु-ऐसा ही होगा।’’
इसी वर के प्रताप से धरा ने ब्रजमण्डल के एक सुमुख नामक गोप एवं उनकी पत्नी पाटला की कन्या के रूप में भारतवर्ष में जन्म धारण किया। उस समय जबकि स्वयं भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के अवतरण का समय हो चला था, श्वेतवाराहकल्प की अट्ठाईसवीं चतुर्युगी के द्वार का अन्त हो रहा था। पाटला ने अपनी कन्या का नाम श्यशोदाश् रखा। यशोदा का विवाह ब्रजराज नन्द से हुआ। ये नन्द पूर्वजन्म में वही द्रोण नामक वसु थे, जिन्हें ब्रह्मा ने वर दिया था। भगवान की नित्यलीला में भी एक यशोदा हैं। वे भगवान श्रीकृष्णचन्द्र की नित्य माता हैं। पुत्र जन्म वात्सल्य रस की घनीभूत मूर्ति यशोदा रानी सदा भगवान को वात्सल्य रस का आस्वादन कराया करती हैं। जब भगवान के अवतरण का समय हुआ, तब इन चिदानन्दमयी, वात्सल्यरसमयी यशोदा का भी इन यशोदाख्1, में ही आवेश हो गया।
पाटलीपुत्री यशोदा नित्य यशोदा से मिलकर एकमेक हो गयीं तथा इन्हीं यशोदा के पुत्र में आनंदकन्द परब्रह्म पुरुषोत्तम स्वयं भगवान श्रीकृष्णचन्द्र अवतीर्ण हुए। जब भगवान अवतीर्ण हुए थे, उस समय यशोदा की आयु ढल चुकी थी। इससे पूर्व अपने पति नन्द के साथ यशोदा ने न जाने कितनी चेष्टा की थी कि पुत्र होय पर पुत्र हुआ नहीं। अतः जब पुत्र हुआ, तब फिर आनंद का कहना ही क्या है। यशोदा जी चुपचाप शान्त होकर सोयी थीं। रोहिणी की आँखें भी बन्द थीं। अचानक सूतिका गृह अभिनव प्रकाश से भर गया।
सर्वप्रथम रोहिणी माता की आँख खुली। वे जान गयीं कि यशोदा ने पुत्र को जन्म दिया है। विलम्ब होते देख रोहिणी जी दासियों से बोल उठीं- ’’अरी! तुम सब क्या देखती ही रहोगी? कोई दौड़कर नन्द को सूचना दे दो।’’ फिर क्या था, दूसरे ही क्षण सूतिकागार आनन्द और कोलाहल में डूब गया। एक नन्द को सूचना देने के लिये दौड़ी। एक दाई को बुलाने के लिये गयी। एक शहनाई वाले के यहाँ गयी। चारों ओर आनन्द का साम्राज्य छा गया। यशोदा को पुत्र हुआ है, इस आनंद में सारा ब्रजपुर निमग्न हो गया। कृष्ण तथा यशोदा छठे दिन यशोदा ने अपने पुत्र की छठी पूजी। नन्द ने इतना दान दिया कि याचकों को और कहीं माँगने की आवश्यकता ही समाप्त हो गयी।
सम्पूर्ण ब्रज ही मानो प्रेमानन्द में डूब गया। माता यशोदा बड़ी ललक से हाथ बढ़ाती हैं और अपने हृदयधन को उठा लेती हैं तथा शिशु के अधरों को खोलकर अपना स्तन उसके मुख में देती हैं। भगवान शिशुरूप में माँ के इस वात्सल्य का बड़े ही प्रेम से पान करने लगते हैं। इसके दूसरे दिन से ही मानो यशोदा-वात्सल्य-सिन्धु का मन्थन आरम्भ हो गया, मानों स्वयं जगदीश्वर अपनी जननी का हृदय मथते हुए राशि-राशि भावरत्न निकाल-निकालकर बिखेरने लगे, बतलाने लगे, घोषणा करने लगे- ष्जगत की देवियो! देखो, यदि तुममें से कोई मुझ परब्रह्म पुरुषोत्तम को अपना पुत्र बनाना चाहो तो मैं पुत्र भी बन सकता हूंय पर पुत्र बनाकर मुझे कैसे प्यार किया जाता है, वात्सल्यभाव से मेरा भजन कैसे होता है, इसकी तुम्हें शिक्षा लेनी पड़ेगी।
इसीलिये इन सर्वथा अनमोल रत्नों को निकालकर मैं जगत में छोड़ दे रहा हूं, ये ही तुम्हारे आर्दश होंगे, इन्हें पिरोकर अपने हृदय का हार बना लेना। हृदय आलोकित हो जायगाय इस आलोक में आगे बढ़कर पुत्ररूप से मुझे पा लोगी, अनन्त काल के लिये सुखी हो जाओगी।’’ वात्सल्यमयी माता माता यशोदा का कृष्ण के प्रति बड़ा लगाव था। जब कंस के द्वारा भेजी हुई पूतना अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर गोपी वेश में यशोदा नन्दन श्रीकृष्ण को मारने के लिये आयी। उसने अपना स्तन श्रीकृष्ण के मुख में दे दिया।
श्रीकृष्ण दूध के साथ उसके प्राणों को भी पी गये। शरीर छोड़ते समय श्रीकृष्ण को लेकर पूतना मथुरा की ओर दौड़ी। उस समय यशोदा के प्राण भी श्रीकृष्ण के साथ चले गये। उनके जीवन में चेतना का संचार तब हुआ, जब गोप-सुन्दरियों ने श्रीकृष्ण को लाकर उनकी गोद में डाल दिया।  DKS

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