प्रभुपाद श्रीतीन कौड़ी गोस्वामीजी महाराज के तिरोभाव महोत्सव के उपलक्ष्य पर विशेष:

– श्रीबाबा महाराज के माता—पिता द्वारा रखा गया नाम (श्री किशोरीकिशोरानन्द दास बाबा महाराज) था  

वृन्दावन, 11 फरवरी 2018, (VT) (Anjanna Agarwal) वृन्दावन की पावन भूमि के लिए जब एक सुनहरा दिन था, जब सन् १९०६ माघी पूर्णिमा के दिन जन्म लेते ही इस बालक को पिता श्रीहरिमोहन गोस्वामी तथा माता सुरधुना गोस्वामी ने अपना पुत्र ही नहीं माना क्योंकि वे छः पुत्र एवं एक कन्या को जन्मते ही गँवा चुके थे और अपने भाग्य में सन्तान का होना विधाता के लेख में न होना निश्चय कर चुके थे। पुत्र जन्म का हर्ष भावी विछोह की दुःख रूपी जरायु में लिपटा हुआ था।
पिता-माता ने कहा- हम इसे अपना पुत्र मानते ही नहीं। नाल काट रही दाई ने कहा- आपका नहीं, यह मेरा पुत्र रहा। दूसरे का होकर शायद जीवित रहे। फिर उस दाई ने तीन कौड़ियाँ देकर शिशु को खरीद लिया। इसलिये इनका नाम बाल्यकाल से लेकर अन्त तक तीन कौड़ी गोस्वामी प्रसिद्ध हुआ। पिता जी ने नाम रखा था श्रीकिशोरी किशोरानन्द- किशोरी श्रीराधाजी तथा उनके प्राण किशोर श्रीश्यामसुन्दर का आनन्द विधान करने वाला।
इन तीन कौड़ी में खरीदे बालक-सन्त ने लगभग तीन लाख जीवों को खरीद लिया कृष्ण दीक्षा, भजन शिक्षा देकर। आप कहीं भी रहते, पर मन आपका श्रीवृन्दावन में रहा करता। अतः वृन्दावन में श्री श्रीराधामुरारी मोहन कुंज की स्थापना कर इसमें अपने इष्टदेवों को प्रतिष्ठित किया।
तीन विशाल आश्रमों का श्रीराधाकुण्ड, श्री तपोवन एवम श्री गोवर्धन में इन्हीं तीन कौड़ी गोस्वामी पाद की इच्छा से निर्माण किया गया। समस्त व्रज के गाँव-गाँव में जाकर श्रीहरिनाम का प्रचार, श्रीभागवत श्रवण कराना, केवल ब्रज में ही नहीं, बंगाल, नवद्वीप- नीलाचल, कलकत्ता सर्वत्र आपने अनासक्त रहकर श्रीहरिनाम प्रचार किया। चोरों, लुटेरों, हिंसक जीवों तथा प्रेतों तक का भी आपने अपने भजन प्रताप से उद्धार किया।
एक दिन श्रीराधाकुंड स्थित अपने आश्रम में लेटे-लेटे रात्रि के १० बजे भजन कर रहे थे। इनका सेवक गौरगोविंद कुछ देर पहले ही आश्रम से बाहर गया था, बाहर से सांकर-ताला लगा हुआ था, प्रभु पाद को अँधेरे में ऐसा लगा कि कोई उनके चरण दबा रहा है।
आपने पूछा -कौन है रे ? किन्तु कोई उत्तर नहीं मिला। दो तीन बार पूछा तब आपने अपने शिष्य गौर गोविंद को आवाज लगायी। इतने में ही गौर गोविंद आया प्रभु ने पूछा मेरे चरण कौन दबा रहा था ? उसने कहा – यहाँ तो कोई भी नहीं है बाहर से किवाड़ बंद थे। आप समझ गए कोई प्रेत है अपना उद्धार चाहता है।बाद में पता चला प्रभु के मकान खरीदने से पहले इस मकान में एक व्यक्ति ने आत्महत्या की थी। गोस्वामी जी ने उसके उद्धार के लिए श्रीमद्भागवत सप्ताह कराया। उसके बाद फिर आज तक कभी किसी को उस प्रेत के वहाँ रहने का कोई संकेत नहीं मिला।
अपने अंतिम समय में श्रीगोस्वामीपाद अस्वस्थ रहने लगे। सेवक आपको नीलाचल भुवनेश्वर ले गये। आपकी इच्छा वृन्दावन से जाने की न थी। अतः आपने इसी कुंज में श्रीभागवत सप्ताह आरम्भ करा दिया। मजबूरी में आप नीलाचल पधारे। वहाँ उनके स्वास्थ्य में कुछ सुधार तो हुआ परन्तु बाह्य स्मृति जाती रही। अपने को हर समय वृन्दावन में प्रिया-प्रियतम की सेवा में देखते। नाम-लीला स्मरण करते हुए भी दिन-रात, स्थान का कुछ पता न रहता। श्री ठाकुर जी भी इन्हें अपने पास बुलाने के लिए बेचैन हो उठे।
श्री ठाकुर जी ने बाबा किशोरीदास को स्वपन में जाकर कहा- आपने गोस्वामी को श्रीभागवत-पाठ के बीच ही नीलाचल भेज दिया है। जाओ उन्हें वृन्दावन शीघ्र ले आओ। श्रीकिशोरीदास जी ने पत्र भेजा इनके पास। जिसे सुनते ही इन्होंने बोलना बंद कर दिया, नेत्र बंद कर लिये। दो दिन बाद संकीर्तन करते श्री जीव गोस्वामीपाद की पावन गोद में उन्होंने अपना मस्तक रखा। भक्तों की कीर्तन ध्वनि होने लगी।इतने में अचानक श्रीगोस्वामी उच्च स्वर में श्जय नित्यानन्द राम नित्यानन्द राम कहते हुए 1984 में 77 वर्ष की आयु में नश्वर शरीर को छोड़कर वृन्दावन में श्रीठाकुर मुरारीमोहन के चरणों में सिद्ध देह से आ पहुँचे।
ऐसे परम सिद्ध भागवत श्री तीनकौड़ी गोस्वामी महाराज के श्रीठाकुर के दर्शन तथा उनकी जीवन्त छवि के दर्शन श्री राधा मुरारी मोहन कुंज में प्राप्त होते है। DKS

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