वृन्दावन में सप्तदेवालयों को संवारे तो पर्यटन एवं तीर्थांटन को लगेंगे पंख

– नए मंदिरों की होड़ के चलते प्राचीन मंदिरों का भी हो सौंदर्यीकरण  
– प्रशासन और तीर्थ विकास परिषद ने प्राचीन सप्तदेवालयों को सजाने की अभी तक नहीं ली कोई सुध
वृन्दावन, 09 जनवरी 2017, (VT) मंदिरों के नाम से प्रख्यात वृंदावन में नए मंदिर भले ही श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं। मगर, प्राचीन मंदिरों का सौंदर्य भी इन नए मंदिरों से कहीं कम नहीं। जरूरत बस इन मंदिरों को संवारने की है। प्रदेश सरकार द्वारा गठित उप्र ब्रज तीर्थ विकास परिषद की योजना में अगर इन मंदिरों की भी सुध ली गई तो वृंदावन में न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। बल्कि धरोहर बन चुकी इन इमारतों को भी नया जीवन मिलने की उम्मीद है।
ठा. बांकेबिहारी मंदिर में व्यवस्थाओं के नाम पर दर्शन समय बढ़ाने को अड़े जिला प्रशासन और उप्र तीर्थ विकास परिषद ने अब तक वृंदावन में सबसे प्राचीन सप्तदेवालयों की सुध तक नहीं ली है। जबकि करीब पांच सौ साल पहले जब वृंदावन पूरी तरह वन के रूप में विलुप्त प्रायरू हो चुका था, तब चैतन्य महाप्रभु के अनुयायियों ने यहां सप्तदेवालयों की स्थापना कर मंदिर संस्कृति की एकबार फिर से शुरूआत की थी।
पांच सौ साल पुरानी इन इमारतों में कई को पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित हैं। मगर, इनको संवारने के लिए कोई प्रयास नहीं हुए। जबकि इन इमारतों को इनके धार्मिक महत्व के अनुसार ही संवारा जाए तो वृंदावन में पर्यटन को पंख लगने में सहायक सिद्ध होंगे। लाल पत्थरों से बने इन मंदिरों की नक्कासी आज भी न केवल भारत बल्कि विदेशी भक्तों को भी लुभा रही है। यमुना किनारे जुगलकिशोर मंदिर का संरक्षण भले ही पुरातत्व विभाग ने कर रखा है। मगर, इसे संवारने की सुध नहीं आई। मंदिर पर जमीं धूल इसके रखरखाव की कहानी खुद ही कह रही है। जबकि मंदिर में लाल पत्थर पर नक्कासी श्रद्धालुओं को खुद ही आकर्षित करती है।
यही हालत सप्तदेवालयों में शामिल गोपीनाथ मंदिर का है। लाल पत्थर और राजस्थानी वास्तु का अद्भुत नमूना पेश करते इस मंदिर की कई दीवार दरकने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। सप्तदेवालयों का एक मंदिर गोकुलानंद भी अनदेखी के चलते अपने अस्तित्व से जूझता नजर आ रहा है। DKS

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