ब्रज के रसिकाचार्य – श्री रूप गोस्वामी

भाग 1:  श्रावण की अंधेरी रात है। बहुत देर से घनघोर ‘वृष्टि हो रही है। अभी कुछ धीमी पड़ी है। पर तूफानी हवा अभी भी सांय सांय कर रही है।  कभी बादलों की गड़गड़ाहट दिशाओं को विकम्पित कर जाती है, कभी श्मशान-सी खामोशी छा जाती है। रामकेलि ग्राम से हुसेन शाह की राजधानी गौड़ शहर जाने का पथ पिच्छिल है, कहीं-कहीं घोंटू तक जल है। जब बिजली कौंधती है, तब किंखाव से मंडित एक पालकी और उसे ले जा रहे वाहकों की जरीदार वर्दियों की एक झलक दीख जाती है।
पालकी के भीतर मखमली मसदके सहारे, मुॅंह में फरसी हुक्केकी नल की दबाये चिंतित बैठे हैं हुसेन शाह के राजस्व-मन्त्री सन्तोष देव। बादशाह ने किसी जरूरी काम से उन्हें तलब किया है। हुक्के की गड़गड़ाहट के बीच अम्बूरी तम्बाकू का खुशबूदार धुआॅ उड़ाते हुए वे सोचते जा रहे है कि उनके असमय तलब किये जाने का क्या कारण हो सकता है।
तूफान के कारण वृक्षों के गिर जाने से राजपथ अविरूद्ध है। इसलिए पालकी वाहक राजपथ छोड़ पालकी उधर स ेले जा रहे हैं जिधरं एक धोबी की झोपड़ी है। झोंपड़ी के भीतर से उनके पानी में छप-छप कर चलने का शब्द सुनाई पड़ रहा है। उसे सुन धोबी कहता है धोबिन से – ‘‘कौन है जो इस तूफानी रात में छप-छप करता चला जा रहा है?’’
उत्तर में धोबिन कहती है-‘‘कौन होगा? होगा कोई कुत्ता, या चोर या राजाका कोई गुलाम। और किस की शामत आयी है जो ऐसे में बाहर निकलेगा?
धोबिन की उत्त्क् िसन्तोष देव के कर्ण द्वार से होकर जा टकराई उनके मर्मस्थल से। हुक्केकी निगाली उनके हाथ से छूट गई। मसद का सहारा छोड़ वे तन कर बैठ गये, सोते से जगा दिये गये से और लगे सोचने-‘‘कुत्ता, चोर और राजा का गुलाम, सब एक समान! हाॅं, ठीक ही तो है। बात एक निरक्षर -स्त्री के कण्ठ की है, पर तथ्यपूर्ण है। गुलाम तो गुलाम, राजाका हो या उसकी किसी प्रजाका। पिंजड़ा तो पिंजड़ा, सोने का हो या लोहे का। गुलाम और कुत्ते की ही तरह मालिकका मुॅह निहार करता है और उसके इशारे पर नाचा करता है। चोर और गुलाम में भी क्या भेद है? चोर जिस तरह दूसरे की वस्तुएॅ चुराकर बेच देता है और इस प्रकार कमाये हुए धन का स्वयं भोग करता है, गुलाम भी उसी तरह दुर्लभ मनुष्य-जीवन को, जो प्रभुने उसे अपनी सेवा के लिए दिया है, दूसरे के हाथ बेच उससे कमाये धनका स्वयं भोग करता है।’’
‘‘दासत्व की जंजीरसे मुत्त्कि पानेके लिए मैं सारा जीवन छटपटाता रहा हूॅं। पर जंजीर तोड़ फेंकने के बजाय उसे और पुष्ट ही करता रहा हूॅ। विषय, वैभव, मान-सम्मान जितना कुछ अर्जित किया है, उससे इस सोने की जंजीर पर पालिश ही तो फिरा है, यह ढीली कब हुई है? बस अब हो ली बादशाह की गुलामी। अब नहीं चाहिए मुझे आत्माकी आॅंखों को झुलसा देने वाली विषय-वैभव की चकाचैंध। यह कोई साधारण स्त्री का कण्ठ नहीं, जिसके स्वर की गूंज ने मेरे हृदय में एक अपूर्व आलोड़न की सृष्टि की हैं। यह साक्षात योगमाया की पुकार है। मुझे अब मन्त्रीपद का त्याग कर अपरिमित मान-सम्मान, विषय-सम्पत्ति, स्वजन-परिजन सब कुछ को तिलांजलि देकर उस पथ का पथिक बनना है, जिससे श्रीकृष्ण और उनकी प्रेम-सेवा की प्राप्ति होती है।’’

(गोलोक वासी श्री अवध विहारी कपूर द्वारा लिखित ब्रज के रसिकाचार्य ग्रन्थ से संग्रहीत) –  क्रमशः

(MS)

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