ब्रज के रसिकाचार्य – श्री रूप गोस्वामी (भाग 2)

भाग 2: 

वंश परम्परा

संतोषदेव कौन थे?  इनके पूर्वपुरुष दक्षिण भारत के वैदिक श्रेणी के ब्राह्मण थे। कर्नाट देशके किसी अंचल में उनका राज्य था। परवर्ती कालमें उनके वंशज श्री पद्मनाभ गंगातीर पर वास करने के उद्धेश्य से नवहट्ट (नैहाटी) चले गये थे। उनके पुत्र मुकुन्ददेव गौड़ के बादशाह के एक उच्च कर्मचारी थे, जो गौड़ देश की राजधानी गौड़ शहर के निकट रामकेलि में रहते थे। मुकुन्ददेव के पुत्र श्रीकुमार देव पूर्वबंग के बाक्ला चन्द्रद्वीप में जाकर रहने लगे थे। उनके कई पुत्र थे, जिनमें अमर, सन्तोष और वल्लभ मुख्य थे। उनकी अकाल मृत्यु के पश्चात तीनों के पालन-पोषण का भार मुकुन्ददेव पर आ पड़ा।

शिक्षा

मुकुन्ददेव उन्हें रामकेलि ले गये। उनकी शिक्षा की उत्तम व्यवस्था की। रामकेलि में रामभद्र बाणीविलास को व्याकरण पढ़ाने के लिए नियुत्तक किया। व्याकरण का पाठ समाप्त होने पर उन्हें नवद्वीप भेज दिया। वहाॅं तीनों भाइयोंने सावभौम भट्टाचार्य और उनके छोटें भाई विद्यावाचस्पति से न्याय आदि शास्त्रों का अध्ययन किया। जब वे सभी शास्त्रों में व्युत्पन्न हो गये मुकुन्ददेव ने उन्हे राजकार्य के योग्य बनाने के लिए अरबी और फारसी की शिक्षा देना आवश्यक समझा। इन भाषाओं का अध्ययन करने के लिए उन्होंने उन्हें अपने मित्र सप्तग्राम के शासक सैयद फकरुद्धीन के पास भेज दिया। उनके तत्वावधान में उन्होंने वहाॅं के मुल्लाओं की सहायता से इन भाषाओं पर भी पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया।

राजकार्य

अब तीनों भाई राजकार्य के लिए हर तरह से उपयुत्त्क थे। उनकी विद्वता और बुद्विमत्ता की ख्याति चारों ओर फैलने लगी थी। उनके पितामह के कारण या उनकी अपनी योग्यता के कारण हुसेनशाह की दृष्टि भी उन पर पड़ी। उन्होंने पहले अमरदेव को और संतोषदेव को किसी ऊॅंवे पद पर नियुत्त्क कर दिया। दोनों ने अपनी विलक्षणता का परिचय दिया। कुछ ही दिनों में उन्नति कर अमरदेव ने प्रधान-मन्त्री और सन्तोष ने राजस्व-मन्त्री का पद ग्रहण किया।

दोनों की कार्यदक्षता से प्रसन्न हो हुसेनशाह ने अमर देव को साकार – मल्लिक’ और सन्तोष को दबीर खास’ की उपाधि दी।
राजकार्य करते समय सन्तोष अमरदेव की तरह मुसलमानी पोषाक पहनते, मुसलमानी तौर-तरीके और अदब-कायदे का पालन करते और फारसी भाषा बोलते। उन्हें देख किसी को यह अनुमान करना कठिन होता  वे धर्मनिष्ठ हिन्दू हैं। पर जब वे रामकेलि में अपने घर पर होते तब अमरदेव की ही तरह वैष्णवोचित सदाचार का पालन करते, साधुसंग, शास्त्र-चर्चा, श्रीविग्रह-सेवादि करते और समय-समय पर वृन्दावन लीला का अनुष्ठान करते। वृन्दावन-लीलासे सम्बधिंत उनके द्वारा बनवाये श्यामकुण्ड, राधाकुण्ड ललिताकुण्ड आदि सरोवर वहाॅ आज भी वर्तमान हैं। इसलिए रामकेलि का एक नाम कृष्णकेलि भी है।

(गोलोक वासी श्री अवध विहारी कपूर द्वारा लिखित ब्रज के रसिकाचार्य ग्रन्थ से संग्रहीत)   क्रमशः

(MS)

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