ब्रज के रसिकाचार्य – रूप गोस्वामी का गृह – त्याग

भाग 3

गृह – त्याग: विषय और विधर्मी राजा की सेवा करते हुए सन्तोषदेव का इस प्रकार निरन्तृर नियमित रूपसे सेवा-पूजा, अर्चना और ध्यानादि में लगे रहना दुष्कर था। फिर भी वे यथा संभव अपने आत्मा को उसका स्वाभाविक आहार देने की चेष्टा करते रहते । इसमें जब बाधा पड़ती तो बेचैन हो उठते राजा और माया के दासत्व की बेड़ियाॅ काट फेंकने के लिए। पर माया की वेड़ियों से छुटकारा पाना मनुष्य के अपने बस की बात तो है नहीं। प्रभु ने स्वयं ही कहा है कि इनसे छुटकारा पाने के लिए मेरे शरणापन्न होना आवशयक है-
देवी ह्मेषा गुणमयी मम माया हुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।
इसलिए उन्होंने श्रीचैतन्य महाप्रभु की शरण ली। उन्होंने और उनके अग्रज अमरदेव ने उन्हें पत्र लिखकर कातर भावसे माया के हाथ से अपने उद्वारकी प्रर्थना की। महाप्रभु ने उत्तर में प्रतीक्षा करने का आदेश दिया। कुछ दिन बाद वे स्वयं आये रामकेलि दोनों से मिलने और उन्हें यह आश्वासन देकर चले गये कि उनका उद्वार शीघ्र होगा। उन्हें अपना कृपाभाजन बनाने के प्रमाण-स्वरूप अपनी ओर से नाम दे गये-सनातन और रूप। वल्लभका नाम रख गये-अनुपम।
सन्तोष देव अब सन्तोष देव न रहे। रूप गोस्वामी के रूपमें उनका नया जन्म हुआ और वैष्णव-समाज में वे इसी नामसे पुकारे जाने लगे। महाप्रभु के चले जाने के पश्चात् उन्होंने पुरश्चरण किया, जिससे चैतन्य-चरण की शीघ्र प्राप्ति हो। पर उनकी प्रतिक्षा की घड़ी अभी भी बीती नहीं थी। प्रतिक्षा करते-करते वे धैर्य खो चुके थे, जब उपरोत्त्क किंवदंती के अनुसार धोबिन के शब्द उनके कान में पड़े। उन्हें महाप्रभु की प्रेरणा से योगमाया की पुकार जान, उन्होंने उसी क्षण गृह त्याग करने का निश्चय कर लिया।
बादशाह से मिलकर और उनकी समस्या का समाधान कर वे जब घर लौटे, तब भी धोबिन के शब्द उनके कानमें गूंज रहे थे। सनातन गोस्वामी से उन्होंने जाते ही कहा-‘‘मेरे लिए महाप्रभु की पुकार पड़ चुकी है। अब मैं और विलम्ब न करुॅंगा। मुझे संसार त्यागकर सदाके लिए उनकी शरणमें जाने की अनुमति प्रदान करें।’’
सनातन सुन कर अवाक! रूप गोस्वामी से घटना का सारा विवरण सुनने के पश्चात् वे बोले-‘‘तुम्हारा संकल्प शुभ हैं। पर संसार का त्याग मुझे भी तो करना है। जितनी जल्दी हम दोनों इस नरक से निकल जायें उतना अच्छा। मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूॅं। मैंने सोचा था कि मैं तुमसे पहले निकल जाऊॅंगा। मेरे पीछे समस्त आश्रितजनों की समुचित व्यवस्थाकर तुम भी चले आओगे। अभी तक मैं कभी का चला भी गया होता। पर महाप्रभु के आदेश के कारण किसी प्रकार रुक रहा था। अब यदि तुमने ऐसा संकल्प कर ही लिया हैं तो पहले मुझे जाने दो।’’
रुप गोस्वामी ने कहा-‘‘मुझे इसमें कोई आपत्ति न होती। आप मेरे ज्येष्ठ भ्राता ही नहीं हैं। मैं आपको अपना पारमार्थिक गुरु

भी मानता हूॅं। आपकी आज्ञाका सदा पालन करने को तत्पर रहता हूॅं। पर आपके ऊपर राज्य का सर्वाधिक दायित्य है। बादशाह आपके ऊपर पूर्ण रूपसे निर्भर हैं। कोई भी कार्य आपसे परामर्श किये बिना नहीं करते। इस समय राज्य की स्थिति भी साधारण नहीं है। उड़ीसा से विवाद चल रहा है। किसी समय युद्ध छिड़ सकता है। इस समय यदि हम दोनों हीी स्तीफा देकर चले जाये ंतो बादशाह को शंका हो सकती है कि हमने उड़ीसा के हिन्दू राजा के साथ मिलकर जान-बूझ कर उन्हें संकट में डालने का षड़यन्त्र किया है। तब वे हमारे और हमारे परिवार के लोगों पर अत्याचार कर सकते हैं और हमारी संसार त्याग करने की योजना खटाई में पंड़ सकती है। इसलिए यह अच्छा होगा कि मैं अकेला स्ती

फा देकर जाऊॅं। आप अवसर देखकर किसी समय पीछे आ जायें। रही परिवार और आश्रितजनों के भरण पोषण की व्यवस्था की बात, तो उसकी आप बिलकुल चिन्ता न करें। मैं जाने के पूर्व सब व्यवस्था कर जाऊॅंगा।’’
सनातन गोस्वामी को सहमत होना पड़ा। दोनों ने मिलकर सारी योजना बना ली। उसके अनुसार रूप गोस्वामी ने स्तीफा दे दिया। आश्रितजनों में से कुछ को चन्द्रद्वीप और कुछ को फतेहाबाद भेज दिया। (भ0र0१/648-649)। उसे अपने आश्रितजनों,

और ब्राह्मण-वैष्णवों में बाॅटकर उसका एक चैथाई आवश्यकता पड़ने पर राजदण्डादिके लिए विश्वस्त लोगों के पास और दस हजार रुपये एक बणिक के पास जमाकर दिये(चै0च02/19/6-9)।
इसी समय एक आदमी को भेजा नीलाचल चैतन्य महाप्रभुका पता करने। उसने लौटकर समाचार दिया कि प्रभु झाड़िखण्ड के पथ से वृन्दावन के लिए चल दिये हैं। उसी समय उन्होंने भी झाड़िखण्ड के रास्ते से अपनी वृन्दावन-यात्रा आरम्भ कर दी। साथ हो लिए उनके छोटे भाई अनुपम (वल्लभ) को मार्ग में उन्हें संवाद मिला कि सनातन को हुसेनशाह ने कैद कर लिया है। उसी समय उन्होंने उन्हें एक गोपनीय पत्र द्वारा उस बणिक के पास रखे दस हजार रुपये घूस में देकर कैदखाने से मुत्त्कि लाभ करने का सुझाव दिया सुझाव कारगर सिद्ध हुआ।

(गोलोक वासी श्री अवध विहारी कपूर द्वारा लिखित ब्रज के रसिकाचार्य ग्रन्थ से संग्रहीत)   क्रमशः

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