ब्रज के रसिकाचार्य – रूप गोस्वामी को महाप्रभु द्वारा प्रेम धर्म की शिक्षा

भाग 3   –  महाप्रभु द्वारा प्रेमधर्म की शिक्षा

दस दिन वहाॅं रहकर उन्होंने रूप को प्रेम धर्म के निगूढ़ तत्व की शिक्षा दी और व्रजरस की व्याख्या की। कविकर्णपूर के ‘‘चैतन्य चन्द्रोदय’’ नाटक और चैतन्य-चरितामृत में उस शिक्षा का विवरण है।
उन्होंने कहा- ‘‘रूप! भत्कि रस के लक्षाणादि सूत्र रुप में कहता हॅू। भक्तिरस-सिन्धु असीम और अतुल है। उसका बिन्दुमात्र तुम्हें आस्वादन कराता हूॅ, सुनो। कोटि ज्ञानियों में कोई एक मुक्त होता है, कोटी मुक्तों में कोई एक कृष्ण-भक्त होता है। कृष्ण भक्त पूर्णरूप से निष्काम होता है। कर्मी, ज्ञानी, योगी आदि पूर्णरूप से निष्काम नहीं होते। उनमें मोक्षादि की कामना रहती है। इसलिए कृष्ण-भक्त पूर्ण शान्त होता है। ज्ञानी, कर्मी आदि अशान्त होते हैं-
कृष्ण-भक्त निष्काम, अतएव शान्त।
भुत्कि-मुत्कि सिद्धिकामी, सकलि अशान्त
भक्ति-लता का बीज किसी भाग्यवान जीव को गुरु और कृष्ण के प्रसाद से प्राप्त होता है। तब वह माली बनकर अपने हृदय क्षेत्र में उसका रोपण करता है, श्रवण और कीर्तन के जल से उसका सींचन करता है। इस प्रकार सींचे जाने पर लता वर्धित होती है। बढ़ते-बढ़ते विराजा, ब्राह्मलोक और वैकुण्ठ को भेदकर गोलोक-वृन्दावन में कृष्ण-चरण रूपी कल्पवृक्ष से जा लिपटती है। वहाॅं उसमें प्रेमरूपी

फूल उत्पन्न होता है, जिसका आस्वादन कर माली धन्य होता है। पर यदि उसके बढ़ते-बढ़ते वैष्णव -अपराधीरूपी मत्त हाथी कहीं से आ जाए, तो उसे उखाड़ फेंकता है, या तोड़ डालता है। तोड़ने पर उसके पत्ते सूख जाते हैं। और यदि भक्ति-लता के साथ-साथ उसमें भुक्ति-मुक्ति-वांछा, निषिद्धाचार ,जीव-हिंसा, लाभ-पूजा-प्रतिष्ठादि की उपशाखाएॅ निकल आये ंतो मूल शाखा बढ़ने नहीं पाती। इसलिए माली प्रारम्भ से ही इन उपशाखाओं को छाॅट देता है। तभी मूल शाखा बढ़ती है, क्योंकि अन्य सभी वांछाओं, देवताओं और कर्म-ज्ञानादि का परित्यागकर सर्वेन्द्रियों से कृष्णानुशीलन या कृष्ण-सेवा करने का नाम ही शुद्धा भक्ति है-
अन्य वांछा, अन्य पूजा छाड़ि ज्ञान-कर्म।
आनुकूल्ये सर्वेन्द्रिये कृष्णानुशीलन।।
श्रीमöागवत और पज्चरात्र में शुद्धा-भक्ति का इसी प्रकार वर्णन है-
सर्वोपाधि विनिर्मुक्त तत्परत्वेन निर्मलम्।
हुषीकेण हुषीकेश-सेवन भत्किरुच्यते।।
भुत्कि-मुत्कि की वांछा रहते साधना करने से भी प्रेम का उदय नहीं होता-
भुत्कि-मुत्कि आदि-वांछा यदि मने हय।
साधन करिले प्रेम उत्पन्न ना हय।।
शुद्धा भक्ति की साधना से रति का उदय होता है। रति गाढ़ होने से प्रेम होता है। प्रेम क्रमशः वृद्धि प्राप्तकर स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव और महाभाव में परिणत होता है।
कृष्ण-भक्तिरस पाॅच प्रकार का है-शान्त, दास्य, संख्य, वात्सल्य और मधुर। ये मुख्य भक्ति-रस हैं, जो स्थायी रुप से भत्क के हृदय में रहते हैं। हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, वीभत्स और भय सांत गौण रस है, जो कारण विशेष से आगन्तुक रूप से उत्पन्न होते हैं।
शान्त भक्त हैं नवयोगेन्द्र और सनकादि। दास्य भत्क है हनुमान वात्सल्य भत्क हैं नन्द-योशदा, वासुदेव-देवकी और श्रीकृष्ण के गुरुजन। मधुर रस की भत्क हैं व्रज की गोपियाॅं तथा द्वारका और मथुरा की महिषीगण। शान्त भक्ति रस के दो प्रधान गुण हैं- कृष्णनिष्ठा और तृष्णा-त्याग। शान्त भक्त स्वर्ग और मोक्षादि की कामना नहीं करता। वह कृष्ण को परब्रह्म, परमात्मा, रूप में देखता है। पर कृष्ण के प्रति उसमें ममता की गन्ध भी नहीं होती। दास्य भक्त में कृष्ण के प्रति एकनिष्ठता और तृष्णा-त्याग तो होता ही है, कृष्ण के प्रति गौरव और संभ्रम के साथ सेवा भाव भी होता है। सख्य रस में कृष्णनिष्ठा, तृष्णा-त्याग और कृष्ण सेवा के अतिरित्क कृष्ण के प्रति ममता और आत्मसम ज्ञान होता है।
इसलिये संख्यरस में कृष्ण-सेवा सम्भ्रम-संकोच-रहित होती है। वात्सल्यरस में शान्तरस की निष्ठा, दास्य की सेवा और सख्य के असम्भ्रम और असंकोच के साथ ममताधिक्य के कारण ताड़न-भत्र्सन भी होता है। वात्सल्यभाव का भक्त अपने को कृष्ण का पालक और कृष्ण को पाल्य मानता है। मधुरस में कृष्ण-निष्ठा, सम्भ्रमरहित सेवा, ममता और लालन वात्सल्य रस से भी अधिक होता है। साथ ही मधुरस में कान्ताभाव से कृष्ण को आपना अगं देकर सेवा करने की प्रवृति भी होती है।
भक्ति की इस प्रकार व्याख्या कर महाप्रभु बोले-‘‘रूप मैंने तुम्हें भक्तिरस का दिगदर्शन मात्र कराया है। तुम मन ही मन भावना द्वारा इसका विस्तार करना। भावना करते-करते अन्तःकरण में कृष्ण की स्फूर्ति होती है और कृष्ण की कृपा से अज्ञ व्यक्ति भी रससिन्धु पार कर लेता है।’’

(गोलोक वासी श्री अवध विहारी कपूर द्वारा लिखित ब्रज के रसिकाचार्य ग्रन्थ से संग्रहीत) –  क्रमशः

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