ब्रज के रसिकाचार्य – रूप गोस्वामी का प्रयाग में महाप्रभु से मिलन

भाग 3

प्रयाग में महाप्रभु से मिलन

प्रयाग पहॅुच कर उन्होंने सुना कि महाप्रभु वृन्दावन से लौटकर यहाॅ आये हुए है और इस समय बिन्दुमाधव-मन्दिर में दर्शन करने गये हैं। यह सुन उनके आनन्द की सीमा न रही। वे चल पड़े बिन्दुमाधव मन्दिरकी ओर। मन्दिर के निकट पहॅुचते ही उन्होंने देखी भावविभोर अवस्था में नृत्य-कीर्तन करते महाप्रभु आनन्दघन मूर्ति और उन्हें घेर कर नृत्य-कीर्तन करते सहस्रों दर्शनार्थियों की भीड़।
भाव-विभोर अवस्था में नृत्य-कीर्तन महाप्रभु की अनुपम रूप माधुरी के दूर से दर्शन कर रूप भी भावाविष्ट हो गये और उन

के नेत्रों से बह चली प्रेमाश्रुओं की धारा। पर उस भीड़ में उनके सम्मुख होना तो सम्भव था नहीं। कुछ देर बाद वे उनसे जाकर मिले एक दाक्षिणात्य ब्राह्मण के घर, जहाॅं उनका उस दिन निमन्त्रण था। जैसे ही उन्होंने महाप्रभु को दण्डवत् की उन्होंने आनन्दोल्लसित हो उन्हें उठाकर आलिंगन करते हुए इतिहास-सम्मुचय का निम्न श्लोक पढ़ा- न मे ऽ भत्त्कश्चतुर्वेदी मद्भत्त्कः स्वपचः प्रियः।
तस्तै देयं ततो ग्राह्मं स च पूज्यो यथा ह्महम।।
अर्थात चतुर्वेदाध्यायी ब्राह्मणभी मेरा प्रिय नहीं है, यदि वह भत्त्किशून्य है। भक्तिमान् पुरुष चाण्डाल भी है, तो मेरा प्रिय है। चाण्डाल होते हुए भी वह सत्पात्र है। उसी को दान करना चाहिए, उसी से ग्रहण करना चाहिए, उसी की मेरे समान पूजा करना चाहिए।
यह श्लोक पढ़ महाप्रभु ने दोनों के सिर पर अपना चरण स्थापित कर उन्हें आशीर्वाद दिया।
महाप्रभु का कृपा-आशीर्वाद प्राप्त कर श्रीरूप ने स्वयं रचित निम्न श्लोक द्वारा उनकी स्तुति की-
‘‘नमो महावदान्याय कृष्णप्रेम प्रदायते।
कृष्णाय कृष्ण चैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः।।
महावदान्य, कृष्ण-प्रेम-प्रदाता, कृष्ण-स्वरुप कृष्णचैतन्यनामा

गौरांगरूपधारी प्रभु, तुम्हेें नमस्कार करता हूॅं।’’ (चै0च0 2/18/50-53)
महाप्रभु ने कहा-‘‘आहा! कृष्ण की कैसी कृपा है तुम्हारे ऊपर, जो भव-कूप से तुम्हारा उद्धार किया। तुम दोनों कितने भाग्यशाली हो!’’
तब रूप को निकट बैठाकर उन्होंने सनातन का समाचार पूछा। रूप ने कहा- ‘‘उन्हें हुसेनशाहने बन्दी कर रखा है। वे कारागार में है। आपकी कृपा हो तभी उनका उद्धार हो सकता है।’’
महाप्रभु ने कहा-‘‘सनातन का उद्धार हो चुका है। उनका शीघ्र मुझसे मिलन होगा’’।
उस दिन रूप और अनुपम ने उस दाक्षिणात्य ब्राह्मण घर ही अवस्थान किया। महाप्रभु के प्रसाद ग्रहण कर चुकने के बाद उनका अवशिष्ट ग्रहण किया।
महाप्रभु त्रिवेणी तीर पर एक भक्त के घर ठहरे थे। उन्ही के निकट एक कुटियामे यह दोनों भाई भी ठहर गये।
उस समय त्रिवेणी से कुछ दूर अड़ैल ग्राम में श्रीपाद वल्लभाचार्य रहते थे। (चै0च02/12/61)। महाप्रभु के शुभागमन के विषय में सुनकर वे उन्हें सपार्षद निमन्त्रण करने आये। वे रूप की दिव्य कान्ति और उनके भावावेष को देख मुग्ध हो गये। महाप्रभु ने जब उनका और अनुपम का परिचय दिया तो वे उन्हें प्रेमसे आलिंगन कर ते अग्रसर हुए। दोनों भाई चकित हो पीछे खिसकते हुए बोले ‘‘नहीं, नहीं श्रीपांद, हमे स्पर्श न करें। कहाॅ हम अस्पृश्य, पामर, कहाॅ आप! हम आपके स्पर्श के योग्य नहीं।’’
ऐश्वर्य और विलास के तुंग शिखर पर रहने के चिरअभ्यासी रूप का इस प्रकार दैन्य और वैराग्य देख महाप्रभु प्रसन्न हुए। वे दूर से ही यह देख तृप्ति पूर्वक मन्द-मन्द मुस्काते रहे और वल्लभाचार्य से बोले-‘‘श्रीपाद, आप इन्हे स्पर्श न करें। ये अति हीन हैं। आप जैसे वैदिक, याज्ञिक और कुलीन व्यक्ति के स्पर्श करने योग्य नहीं।’’
वल्लाभाचार्य ने कहा-‘‘पर इन्हें दोनों को मैं निरन्तर कृष्ण-नाम करते देख रहा हूॅं। फिर ये हीन कैसे? ये तो सर्वोत्तम हैं।
अहो बात श्वपचोऽतो गरीयान यज्जिह्नाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।
ते पुस्तापस्ते जहुवुः सस्नृरार्या ब्राह्मानूचूर्नाम गृणन्ति ये ते।। (चै0च03/33/7)
-अहो! वह चाण्डाल भी सर्वश्रेष्ठ हैं, जिसकी जिहृा के अग्रभाग में आपका नाम (भगवन्नाम) विराजमान है। जो

श्रेष्ठ पुरुष आपका नाम उच्चारण करते हैं, उन्होंने तप, हवन, तीर्थस्नान, सदाचार का पालन और वेदाध्ययन सब कुछ कर लिया।’’
यह सुन महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए और प्रेमावेश में यह श्लोक पढ़ाने लगे-
‘‘भगवद्भक्ति हीनस्य जातिः शास्त्रं जपस्तपः।
अप्राण स्यैव देहस्य मण्डनं लो करज्जनम्।।
शुचिः सद्भक्तिदीप्ताग्निदग्ध दुर्जाति कल्मषः।।

स्वापाकोऽपि बुधै: श्लाध्यो न वेदज्ञेऽपि नास्तिकः।।
(चै0च02/19/74-75 में उद्धत हरिभत्किसुधोदयका 3।11-12 श्लोक)
-सच्चरित्र और सद्भत्किरूप दीप्ताग्नि द्वारा जिसका दुर्जातित्व-कलमष दग्ध हो गया है, ऐसा चाण्डाल भी पण्डितों के सम्मान के योग्य है। भत्त्किहीन व्यक्ति की सज्जाति और उसका शास्त्रज्ञान, जप, तपादि मृत देह के अलंकार के समान किसी काम के नहीं। वे केवल लोकरज्जन के लिए हैं।’’
वल्लभाचार्य महाप्रभु को नौका पर बिठाकर अपने घर ले गये। वे उनके शरीर में श्रीकृष्ण के दर्शनकर कृतार्थ हुए। उन्होंने उनका पादप्रक्षालन किया। वंशसहित उस जल को मस्तक पर धारण किया। भक्ति-पूर्वक धूप-दीपादि से उनका महापूजन किया। उन्हें अनिवेदित द्रव्य का भोजन कराया। भोजन के उपरान्त उन्हें शयन कराया और उनका पाद-सम्वाहन किया।
महाप्रभु के आगमन का संवाद पाते ही असंख्य लोग उनके दर्शन को आने लगे। तब भीड़ के भय से नौका पर सवार हो वे त्रिवेणी के दशाश्वमेध घाट पर चले गये और वहाॅं रूप और वल्लभ सहित एक निर्जन कुटी में रहने लगे।

(गोलोक वासी श्री अवध विहारी कपूर द्वारा लिखित ब्रज के रसिकाचार्य ग्रन्थ से संग्रहीत) –  क्रमशः

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