परम पूज्य सिद्ध सन्त श्रीकृपासिन्धुदास जी महाराज के तिरोभाव महोत्सव पर विशेष :

Baba Kripa Sindhu Das ji Maharaj & his Samdhi श्रीधाम वृंदावन (VT)  28 Dec, 2017 :

भागवत निवास ट्रस्ट के संस्थापक परम सिद्ध बाबा श्री कृपासिंधु दास जी महाराज, जिन्होंने सिद्ध पंडित बाबा श्री रामकृष्ण दास जी महाराज की अद्भुत सेवा की ।

श्रीकृपासिन्धुदास बाबा का जन्म वर्तमान बंगाल के चट्ट गाँव में सम्वत २०३७(वर्ष 1881) में एक सम्पन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ। बाबा ने मात्र 17 वर्ष की अवस्था में सांसारिकता का परित्याग कर श्रीधाम वृन्दावन की राह पकड़ ली और गोविन्द कुण्ड के सिद्ध वैष्णव श्रीकृष्णदास जी से दीक्षा ली और भजनाविष्ट हो गये। बाद में पण्डित बाबा के सानिध्य में आये और फिर तो जैसे उनकी परछाई बनकर दाऊजी की बगीची (वर्तमान वृन्दावन शोध संस्थान) में पण्डित बाबा के सर्वप्रमुख सेवक हो गये।

पण्डित बाबा(श्री रामकृष्ण दास जी महाराज) किसी को शिष्य नहीं बनाते थे पर स्वास्थ्य बिगड़ने पर बाबा श्री कृपासिंधु दास जी को उनके गुरुदेव ने बाबा की सेवा में भेजा कि तुम जाओ और पंडित बाबा की सेवा में रहो । पंडित बाबा सेवा लेते नही थे किसी की । वापिस भेज दिया इन्हें । दो तीन बार ऐसा हुआ। पर स्वास्थ्य बिगड़ने पर बाबा श्रीकृपासिंधु दास जी को उनके श्री गुरु बाबा ने फिर से सेवा में भेजा , तब उन्होंने बहुत सेवा की। जब पंडित बाबा पूर्ण स्वस्थ हो गए तो उन्होंने श्री कृपासिंधुदास बाबा से कहा – अब मै ठीक है गयौ, तू अपने गाम जा। परन्तु बाबा नहीं गए।

फिर एक दिन बाबा ने जोर देकर कहा -बोले , तू मेरी बात नहीं मानोगे ?

श्रीकृपासिंधु जी बोले – मै आपकी बात क्यों मानूँ ?आप मेरे गुरु थोड़े ही हो, मै अपने गुरु की बात मानूंगा, जब मेरे गुरु जी बुलायेगे तभी जाऊँगा।

बाबा ने फिर जीवन भर न तो श्री कृपासिंधु जी को जाने को कहा और न ही श्री कृपासिंधु जी गए। बाद में इन दोनों में इतना तारतम्य हो गया था कि एक बार जब पंडित बाबा के दाँत में दर्द हुआ और डाक्टर आया, और बाबा से पूछा – बाबा किस दाँत में दर्द है तो ये बात बाबा को स्वयं भी नहीं मालूम थी ।उन्होंने डाक्टर से कहा कि कृपासिंधु को बुलाओ वह बताएगा और सच में श्रीकृपासिंधु जी ने डाक्टर को बताया कि बाबा के इस दाँत में दर्द है।

एक बार जब श्रीकृपासिंधु जी कहीं बाहर गए हुए थे,यहाँ बाबा चलने फिरने की अवस्था में नहीं थे,तब उन्हें प्यास लगी। मुख से बोलते भी नहीं बनता,बोलते तो किसी को समझ में नहीं आता। यहाँ जब श्री कृपासिंधु जी को बार बार प्यास लगी तो मन में सोचने लगे ,इतना पानी पीने पर भी मेरी प्यास क्यों नहीं बुझती?जरुर कुछ गडबड है। जब वे वापस आये और बाबा के पास गए तो समझ गए कि बाबा को प्यास लगी है इसीलिए मुझे बार-बार प्यास लग रही थी।

पण्डित बाबा की सेवा में आप तल्लीन होकर उत्कट वैराग्य भाव से अपने भजन पथ पर आगे बढते चले गये। श्रीपण्डित बाबा के नित्य लीला प्रवेश के उपरान्त जब आपकी मानसिक दशा विछोह के कारण कुछ असहज हो गयी तो पण्डित बाबा के जयपुर निवासी एक राजपरिवार शिष्यगण ने आपको दाऊजी की बगीची के ठीक सामने एक विशाल मनोहारी स्थल अर्पित कर दिया और प्रार्थना की कि अब आप ही श्रीमाध्वगौडेश्वर सम्प्रदाय का नेतृत्व करें और पण्डित बाबा के निज श्री गिरिराज ठाकुर श्री गिरीन्द्रबिहारी जी महाराज की सेवा अपने हाथ में लेना स्वीकार करें।

ठाकुर श्रीगिरिन्द्रबिहारी जी महाराज वह सर्वप्रथम श्रीगिरिराज हैं जिन्हें ब्रज में गोवर्धन प्रवास के दौरान श्रीचैतन्य महाप्रभु ने सर्वप्रथम शालिग्राम स्वरुप सेवा करने का शुभारम्भ किया था।

लता-पता और पेड़ पौधो से आच्छादित भागवत निवास की स्थापना वर्ष 1942 में हुई और तभी से श्रीमाध्वगौडेश्वर सम्प्रदाय के सैंकडों वैष्णवों और साधुओं ने श्रीकृपासिन्धुदास जी महाराज के बनाये वैष्णव आचार-विचार की मर्यादा के अधीन उत्कट वैराग्य धारण कर मात्र ब्रजवासियों द्वारा दी गयी मधुकरी (भिक्षावृत्ति) पर आश्रित रहकर इस दिव्य भजनस्थली की दिव्य आभा को अपने भजन और हरिनाम बल से प्रकाशित किया है और वर्तमान में यह दिव्य भजनस्थली अपने नाम की सार्थकता का ज्वलन्त उदाहरण है जो इस घोर कलिकाल में आडम्बर से दूर अपनी रमणीयता को बचाये हुए है।

श्रीबाबा महाराज की जीवनी के एक प्रसंग के अनुसार नेताजी सुभाषचन्द्रबोस भी इस भागवत निवास में आकर अपने अन्तिमकाल में बाबा श्रीकृपासिन्धु दास जी महाराज से सत्संग चर्चा कर भजन को सर्वोपरि मानने में ही जीवन का सारगर्भित सत्य स्वीकार कर चुके हैं। आज ही के दिन पौष शुक्ल दशमी को बाबा श्री कृपासिन्धु दास जी इस धराधाम को छोड़ नित्यलीला में प्रविष्ट हो गए।

साभार : अंजना अग्रवाल, श्रीराधारमण दासी परिकर

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