आज सिद्ध बाबा श्रील प्राणकृष्णदास जी के तिरोभाव महोत्सव पर विशेष :::

Vrindavan, 09 Nov. 2017, (VT) श्रीकृष्ण कथा रस में निरंतर निमज्जन करने वाले श्री प्राणकृष्णदास बाबा का जन्म सन 1802 में पश्चिम बंगाल में वर्धमान जिले के कालना के निकट बागानपाड़ा में हुआ। श्री जाह्ववा माता की परम्परा में श्री नित्यानंद परिवार के बागानपाड़ा के श्री यदुनंदन गोस्वामी जी महाराज से इन्होंने दीक्षा ग्रहण की। युवावस्था में वैराग्य तीव्र होने पर कालना के सिद्ध बाबा भगवानदास जी महाराज की शरण में आकर बहुत काल तक भजन करते रहे।

एक दिन बाबा की आज्ञा लेकर श्रीधाम वृंदावन के लिए प्रस्थान किया। संपूर्ण ब्रज का दर्शन करने के पश्चात श्री वृंदावन धाम में कालीदह स्थान पर रुक गए। यहां पर दो सिद्ध बाबा भजन करते थे। प्रथम श्री जगदीशदास जी एवं द्वितीय श्रीदयालदास जी। इन दोनों के दर्शन करते ही अपने को इनके चरणों में समर्पित कर दिया और इन दोनों महापुरुषों की सेवा भावपूर्वक करने लगे। महात्मा निरंतर श्रीकृष्णलीला का चिंतन करते हुए अपने तन- मन की सुध खोकर भाव राज्य में डूबे रहते। श्री प्राणकृष्णदास जी इनके आहार की व्यवस्था करते, उनके कर-चरणादि सम्वाहन करते, इनके मल-मूत्र का भी परिष्कार करते और मानसिक स्थिति के अनुसार इनके बदलते भावों को जानकर बहुत निपुणतापूर्वक भावानुकूल सेवा करते।

इन दोनों की सेवा करते -करते इन संतों के आशीर्वाद से श्री प्राणकृष्णदास जी भी मानसी लीला में सिद्ध हो गये। श्री प्राणकृष्णदास जी नित्य कालीदह के चारों ओर दूर-दूर तक झाड़ू लगाते और मा्नसी सेवा में मंजरी भाव से निकुंज में सोनी सेवा लगाने की भावना किया करते। झाड़ू लगाते- लगाते बालक, वृद्ध जो भी सामने आ जाते उसे झाडू रखकर प्रणाम करते।

कालीदह स्थान पर ही बहुत सारे भिखारी पंक्तिबद्व बैठे रहते जो यहां से गुजरने वाले यात्रियों से पैसे मांगते। यहीं बाबा श्री प्राणकृष्णदास जी की छोटी सी कुटिया है। बाबा की अवस्था लगभग 100 वर्ष से अधिक हो जाने पर भी बाबा अपनी कुटिया से बाहर निकल कर यहीं बैठ जाते।यात्रियों से कुछ लेने के लिए नहीं, उन्हें कुछ देने के लिए। जिस प्रकार भिखारी कुछ पाने की इच्छा से भक्तों को बार-बार राधे-राधे कहकर पुकारते इसी प्रकार बाबा भी कुछ देने के लिए बार-बार आग्रह करते लेकिन उनकी रीति अति विचित्र थी।

बाबा किसी भी पथिक को आते देखते तो सर्वप्रथम उसे दंडवत प्रणाम करते फिर उससे कहते प्रसाद ले लो। भक्त प्रसाद लेने पास आता तो उसे प्रसाद देते हुए अत्यंत प्रेमपूर्वक कहते- कृष्णकथा सुनोगे? ऐसी प्रेमभरी वाणी सुनकर कथा सुनने की इच्छा न होने पर भी व्यक्ति कहता- हां बाबा ! थोड़ा सुना दीजिए । फिर बाबा उसे कृष्णकथा सुनाकर ठाकुर जी की ऐसी छवि का वर्णन करते कि जीवन भर के लिए उस व्यक्ति के हृदय में अंकित हो जाती। वह व्यक्ति चला जाता तो पुनः बाबा किसी दूसरे पथिक को कथा सुनाने की राह देखते। बाबा प्राणकृष्णदास जी के प्राण कृष्णकथा में बसते। “यथा नाम तथा गुण” कृष्णकथा कहे या सुने बिना नहीं रह सकते।

बाबा अधिक पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन संतों की कृपा से श्री कृष्णदास कविराज जी द्वारा रचित श्रीगोविंद लीलामृत संपूर्ण कंठ थी। श्यामा-श्याम की अष्टकालीन लीलाओं का नित्य चिंतन करते वृद्धावस्था आ गई लेकिन लीलाओं के चिंतन एवम उनके कहने-सुनने की स्पृहा नहीं मिटी। बाबा पढ़ी-सुनी कथाओं के साथ देखी हुई लीलाओं का भी वर्णन करते।इतने वर्षों से श्रीकृष्ण लीलाओं का चिंतन करते -करते बाबा के हृदय में कृष्णलीला दिखाई देने लगी थी। सन 1938 में रागानुगा भजन का उपदेश करते हुए 136 वर्ष की आयु में बाबा नित्य निकुंज पधारे। कालीद्ह में सिद्ध बाबा जगदीशदास जी की समाधि के निकट इनकी अपनी भजन कुटी के सामने इनकी समाधि है। भजन कुटिया में इनकी छवि विराजमान है। जब भी धाम पधारें एक बार अवश्य दर्शन करें। DKS

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