यमुना प्रदूषण पर क्यों न आपके खिलाफ दर्ज कराई जायें एफआईआर- इलाहाबाद हाईकोर्ट

– यमुना प्रदूषित पर हाईकोर्ट ने की कड़ी टिप्पणी

– मुख्य सचिव, मथुरा वृंदावन विप्रा, नगर निगम, जल निगम व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जारी किया नोटिस

– सुप्रीम कोर्ट के 29 साल पुराने आदेश के बाद भी यमुना मैली- इलाहाबाद हाईकोर्ट

वृन्दावन 08 अक्टूबर 2017,(VT)   हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के 29 साल बाद भी यमुना के प्रदूषित रहने को गंभीरता से लेते हुए प्रदेश शासन के मुख्य सचिव सहित मथुरा वृंदावन विप्रा, नगर निगम, जल निगम व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने पूछा है कि मेहता केस में यमुना को प्रदूषणमुक्त रखने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन 29 साल बाद भी न करने पर क्यों न उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई जाए। कोर्ट ने सभी अधिकारियों से इस पर 26 अक्तूबर तक स्पष्टीकरण के साथ जवाब मांगा है। साथ ही मथुरा-वृंदावन विप्रा को यमुना किनारे अतिक्रमण कर हुए अवैध निर्माण के ध्वस्तीकरण की कार्यवाही जारी रखने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण टंडन एवं न्यायमूर्ति राजीव जोशी की खंडपीठ ने मथुरा के मधु मंगल शुक्ल की जनहित याचिका पर दिया है। मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण ने कोर्ट को बताया कि अवैध निर्माण हटाए जा रहे हैं। 15 दिन में 15 अवैध निर्माण हटाए जा रहे हैं। नगर निगम की तरफ से बताया गया कि शहर से 56 एमएलडी गंदा पानी निकलता है। इसमें से पांच सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों से 44 एमएलडी. पानी शोधित किया जा रहा है। केवल 12 एमएलडी. अतिरिक्त गंदे पानी का शोधन नहीं हो रहा है। कोर्ट ने गत 13 सितम्बर को यमुना में प्रदूषण रोकने के उपाय न कर पाने पर कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा था लेकिन किसी ने जवाब दाखिल नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि 1986 में सुप्रीम कोर्ट ने नदियों को प्रदूषणमुक्त रखने की जिम्मेदारी सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व स्थानीय निकायों को दी थी और कहा था कि योजना बनाकर इस पर अमल किया जाए। कई कानून बने लेकिन सब कागज पर ही रह गया। सात साल से इस जनहित याचिका पर भी सुनवाई हो रही है। मथुरा नगर निगम ने ने एसटीपी के लिए सरकार से धन मांगा है। धन की कमी के कारण गंदा पानी शोधित नहीं हो पा रहा है।

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