‘मैं भक्तन को दास, भगत मेरे मुकुटमणि’..श्रीकृष्ण ने प्रकृति को स्वस्थ एवं सुंदरता के लिए करवायी गोवर्धन पूजा 

गोवर्धन पूजा विशेष आलेख: महंत मधुमंगल शरण दास शुक्ला,श्रीधाम वृन्दावन 

वृन्दावन,20 अक्टूबर 2017, (VT)आनंदकंद भगवान श्रीकृष्ण गोलोक से भूलोक पर जब अवतरित होते हैं, तो मानव इतिहास में विभिन्न क्रांतियां घटती हैं। उनकी लीलाओं में विभिन्न क्रांतियों का दर्शन किया जा सकता है। परम पुरूष होने के नाते वह अपनी परमप्रिया प्रकृति की सेवा करने हेतु ब्रज में लीला करते हैं। मृदभक्षण लीला के माध्यम से भूमि को शुद्ध करना, दावानल का कई बार पान करके अग्नि को शांत करना, तृणावर्त का वध करके वायु को सुखद बनाना, कालिया का दमन कर यमुना के प्रदूषण को दूर करना तथा अपनी प्रेममयी वंशी की धुन से वातावरण को पवित्र करना आदि लीला उनके प्रकृति प्रेम को दर्शाती हैं। इन सब लीलाओं से श्रीकृष्ण ने पंच तत्वात्मक प्रकृति को स्वस्थ किया। 

किंतु श्रीकृष्ण की मूलचिंता थी धार्मिक और आध्यात्मिक जगत में कर्मकांड और ईश्वर के नाम पर मानवता का शोषण। मूलतः पशु पालन एवं पशुपालन पर निर्भर ब्रज का तात्कालिक समाज जल की आपूर्ति हेतु वैदिक देवता इंद्र की विशाल रूप से पूजा करते थे। श्रीकृष्ण ने सदैव इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया कि मानव के लिए वही ज्ञान उपयोगी है, जो विज्ञान समन्वित हो:

‘ज्ञानं परम गुत्यम्बे, यत् विज्ञान समन्वित्ः’ 

इस सिद्धांत के अनुरूप इंद्र को जल प्रदाता मानना कृष्ण को हास्यादपद लगा और उन्होंने ब्रजवासियों के सम्मुख यह प्रस्ताव रखा कि चूंकि ब्रजवासी मुख्यतः ग्राम/वनों में निवास और विचरण करते हैं। अतः उन्हें अपने पर्यावरण का ही पूजन करना चाहिए तथा उन्होंने यह प्रबोध कराया कि विशेष रूप से वर्षा का जल इंद्र से न आकर वृक्ष और पर्वतों की कृपा से उपलब्ध होना है।

अतः उन्होंने इंद्र यज्ञ को त्यागकर पर्यावरण के देवता श्री गोवर्धन को सम्मानित और पूजित करने का उत्सव प्रारंभ किया। श्री गोवर्धन को पुराणों में हरिदास वर्य भी बताया गया है। इस उत्सव का एक और गहरा महत्व है। श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं के द्वारा भक्ति अर्थात् सेवा को ही प्रमुख साधन स्वीकार किया। अतः उनका यह संकल्प था कि आध्यात्म जगत में भी भक्त की प्रतिष्ठा और पूजा सर्वोपरि होनी चाहिए।

भागवत के दशम स्कंध के 21वें अध्याय में वणेगीत के अंतर्गत श्रीकृष्ण की परम उपासिक ब्रज गोपिकागण गोवर्धन महाराज को ही श्रीकृष्ण का सर्वश्रेष्ठ भक्त कहकर संबोधित करते हैं। श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा कि ‘मैं भक्तन को दास, भगत मेरे मु कुटमणि’ ‘अहं भक्त पराधीनं’ आदि आदि। अतः दीपावली के दूसरे दिन इंद्र के स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों के द्वारा भक्त शिरोमणि गोवर्धन महाराज का विधिवत् पूजन अर्चनकराया। इतना ही नहीं पूजन के समय गोवर्धन की प्रत्येक पावन शिला में ब्रजवासियों को श्रीकृष्ण के मुखारबिंद के ही दर्शन हुए। इसका तात्पर्य है कि गोवर्धन पूजन भक्त और भगवान के पूर्ण एकाकार और तादाद में होने का उत्सव है।

गोबर से क्यों बनते हैं गोवर्धननाथ ?

-गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण का गोबर से विग्रह बनाना न केवल धार्मिक मर्यादाओं के अनुरूप है, बल्कि आर्थिक रूप से भी कल्याणकारी  

भारतीय धार्मिक परंपराओं में प्रत्येक देवी-देवता एक न एक पशु पक्षी को अपने वाहन के रूप में प्रयोग करते हैं। श्रीकृष्ण उनक पशु-पक्षी जगत के स्वयं उपासक बन जाते हैं। गोपाल बनकर गऊ का पूजन और सेवा करते हैं। शास्त्रों में ऐसा बताया गया कि सभी प्रकार के देवी-देवता गाय के शरीर में निवास करते हैं, किंतु गाय के गोबर में लक्ष्मी का निवास स्वीकार किया गया है। अतः लक्ष्मी पूजा के अगले दिन गोबर से ही गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण का विग्रह बनाना न केवल धार्मिक मर्यादाओं के अनुरूप है, बल्कि आर्थिक रूप से भी कल्याणकारी है।  भारत जहां पर विश्व की सर्वाधिक पशुधन संख्या है। वहां हमें गोबर का समुचित उपयोग करना आवश्यक है। इससे पर्यावरण के क्षेत्र में तथा आर्थिक जगत में एक सकारात्मक उपलब्धि और क्रांति की जा सकती है।

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