ब्रज के मंदिर-देवालयों में गिरिराज प्रभु की हुई जय-जयकार, मना अन्नकूट

– कहीं अन्नकूट में अन्न का पहाड़ तो कहीं हलुए के पहाड़ के दर्शन, श्रद्धालु आनंद से सराबोर

– ब्रज के मंदिर-देवालयों एवं घरों में बने गोवर्धन,
वृन्दावन, 22 अक्टूबर 2017,(VT) अद्वितीय, अद्भुत, अकल्पनीय, पर्वतराज गोवर्धन की दिव्यता के आगे उपमाओं के ये कसीदे बहुत ही छोटे नजर आए। गिरिराज प्रभु के आंगन में पाश्चात्य संस्कृति भारतीय परिधान पहन मदहोश झूमने लगी। समूचे विश्व का वैभव समेटे पर्वतराज की भोर की किरणों से शुरू हुई दूध की धार ने देर शाम तक रुकने का नाम नहीं लिया। सिर पर टोकरी रखकर विदेशी भक्तों ने अन्नकूट प्रसाद गिरिराज प्रभु को समर्पित किया। मानसीगंगा पर सजी दीपमालाएं दीपोत्सव का गुणगान करती रहीं।
शुक्रवार को गोवर्धन पूजा महोत्सव अपने वैभव के कारण धार्मिक इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया। सुबह करीब नौ बजे राधाकुंड मार्ग स्थित गिरधारी गौड़ीय मठ से देसी-विदेशी भक्तों का कारवां सिर पर अन्नकूट प्रसाद की टोकरी रखकर पर्वतराज को समर्पित करने चला, तो तलहटी अपने देव पर गौरवान्वित नजर आई। समूचा आभा मंडल अपने देव की दिव्यता में ढक गया। हिंदुत्व संस्कृति में रची बसी पाश्चात्य संस्कृति ब्रजभूमि में इठलाने लगी।
वहीं वृन्दावन के मंदिर और देवालयों जैसेः श्रीराधारमण मंदिर, राधावल्लभ मंदिर, गोपीनाथ मंदिर, मदनमोहन मंदिर, राधागोकुलानंद मंदिर, राधाश्याम सुंदर मंदिर, राधादामोदर मंदिर, अद्धैत वट एवं विभिन्न मंदिरों में गोबर से निर्मित गोवर्धन नाथ बनाए गए एवं गोवर्धन पूजा के अवसर पर भव्य अन्नकूट सजाया गया, अन्नकूट, गोवर्धननाथ एवं अपने ठाकुर और ठकुराइन की छवि को निहारकर श्रद्धालु एवं भक्त आनंदित हो उठे और सभी जगह गोवर्धन नाथ जय-जयकार होती रही।
गिरिराजजी का भोग लगाने के लिए ब्रजवासी घर से तरह-तरह के व्यंजन लाए। इससे गिरिराज जी के सन्मुख अन्न का पहाड़ सा खड़ा हो गया, इसीलिए इस उत्सव को अन्नकूट महोत्सव नाम दिया गया। ब्रजवासियों ने पूजा के उपरांत आंचल फैलाकर सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद लिया। इंद्र के कोप से बचायारू गिरिराज की पूजा के उपरांत इंद्रदेव ने कुपित होकर मेघ मालाओं को ब्रज को नष्ट करने का आदेश दिया। मेघों ने घोर गर्जना के साथ बरसात की।
सात वर्ष के सांवरे ने सात दिन, सात रात तक गोवर्धन पर्वत को बाएं हाथ की कनिष्ठ उंगली पर धारण कर ब्रजभूमि और ब्रजवासियों की रक्षा की थी।
प्रसिद्ध है गिरिराज मंदिर:
गिरिराज पर्वत की प्रत्येक छोटी-बड़ी शिलाओं को श्रीकृष्ण का ही स्वरूप माना जाता है। तलहटी के तीन प्रमुख मंदिर हैं। मानसी गंगा के तट पर मुकुट मुखार¨वद मंदिर, दानघाटी मंदिर और जतीपुरा के मुखार¨वद मंदिर पर भव्य उत्सव मनाया गया।

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