तिरोभाव महोत्सव विशेषः सर्वसाधारण के उपकार और कल्याण के लिए बंगला में बहुत ग्रंथों की रचना की थी श्रील नरोत्तम ठाकुर महाशय

वृन्दावन, 12 अक्टूबर 2017,(VT) पदमा नदी से एक मील दूर गरान हाटी के खेतुरी ग्राम में इनका अवतरण हुआ जो कि पूर्व बंग में अवस्थित था। उसी राज्य में स्वामी श्री कृष्णा नंद दत्त मजुमदार के यहाँ नारायणी देवी के गर्भ से ठाकुर नरोत्तम दास जी का जन्म हुआ।
ये बाल्यकाल से ही विरक्त थे, घर में अतुल्य ऐश्वर्य था, सभी प्रकार के संसारी सुख थे, किन्तु इन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता था।ये वैष्णवो से श्री गौरांग की लीलाओ का श्रवण किया करते थे। श्री रूप, श्रीसनातन और श्रीरघुनाथ दास जी के वैराग्य और त्याग की कथाएँ सुन सुनकर इनका मन भी राज्य परिवार और धन सम्पति से एकदम फिर गया।
श्री गौरांग महाप्रभु और उनके बहुत से पार्षद संसार का परित्याग कर चुके थे। उस समय श्रीनरोत्तम बालक थे इन्हें समझ नहीं आ रहा था कहाँ जाए। एक दिन महाप्रभु ने स्वप्न के आदेश किया -कि तुम वृंदावन चले जाओ ! और श्री लोकनाथ गोस्वामी के शिष्य बन जाओ। छिपकर वृंदावन चले गए और सारी बात श्रीजीव गोस्वामी जी को बताई। वे बोले -श्रीलोकनाथ गोस्वामी किसी को भी अपना शिष्य नहीं बनाते।
श्रीलोकनाथ और भूगर्भ गोस्वामी दोनों ही महाप्रभु के संन्यास लेने से पूर्व ही उनकी आज्ञा से वृंदावन में आकर चीरघाट पर एक कुंज कुटीर बनाकर भजन करते थे। श्रीलोकनाथ जी का वैराग्य भी बड़ा अलौकिक था, वे कभी किसी से व्यर्थ बात नहीं करते प्रायरूमौन ही रहते थे। एकान्त स्थान में चुपचाप भजन करते रहते। स्वतः ही जो थोडा बहुत प्राप्त हो गया उसे पा लिया नहीं तो भूखे ही पड़े रहते, शिष्य न बनाने का कठोर नियम कर रखा था।
अब श्रीजीव गोस्वामी इन्हें श्रीलोकनाथ जी के पास ले गए और वैराग्य के बारे में बताया और दीक्षा देने को कहा तो उन्होंने साफ मना कर दिया परन्तु श्रीनरोत्तम ठाकुर जी भी सच्ची श्रद्धा लेकर आये थे। रोज प्रातः श्रीलोकनाथ जी यमुना जी में स्नान को जाया करते और दिनभर कुंज कुटीर में भजन करते। अब दास ठाकुर जी उनकी छिपकर सेवा करने लगे, जहाँ वे शौच जाते उनकी शौच को उठाकर फेक आते, जिस कंकरीले पथरीले मार्ग से वे यमुना स्नान को जाते उसे साफ कर देते, उन्हें हाथ धोने के लिए नरम मिट्टी लाकर रख देते अर्थात जो भी सुख उन्हें सूझता वे कर देते।
जब ये सारी बाते श्रीलोकनाथ जी को पता चलीं तो उनका ह्रदय भर आया। एक वर्ष सेवा के बाद कृपा करके अपने नियम को भंग करते हुए दीक्षा प्रदान की। श्री जीव गोस्वामी जी ने सब प्रकार के योग्य जानकर ’’ठाकुर’’ की उपाधि प्रदान की।
अंतिम समय आने पर आपने एक दिन गंगा स्नान की इच्छा प्रकट की। संकीर्तन सहित आपको आपके शिष्य गंगा तट पर लाये, तट पर बैठकर आपको नहलाया गया। आपके दोनों शिष्य आपके शरीर को धीरे धीरे मल मल कर धोने लगे और सबके देखते देखते शरीर घुल-घलकर दूध निकल कर गंगा में मिलने लगा और अगले ही क्षण गंगा की लहर आई और वहाँ दूध ही दूध हो गया। शरीर का कुछ पता नहीं चला अर्थात शरीर दुग्ध मय होकर गंगा जी में मिल गया।
ठाकुर महाशय संस्कृत के महा पंडित थे लेकिन सर्वसाधारण के उपकार के लिए बंगला में बहुत ग्रंथों की रचना की। प्रार्थना और प्रेमभक्ति चंद्रिका ही अधिक प्रसिद्ध है। गौड़ीय वैष्णवों का ये ग्रन्थ कंठहार है। DKS

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