गोपाष्टमी विशेष : आगयैं आगयैं गईया, पाछैं पाछैं ग्वाल, माखन खईवैं मेरौ मदन गोपाल…

’गोपाष्टमी विशेष आलेखः’

’साभार :  श्रीसुनील गौतम ब्रजवासी जी’

सात दिन में नौ त्योहार यही है ब्रज की असली पहचान
वृन्दावन, 27 अक्टूबर 2017, (VT) सात दिन नौ त्योहार यह है ब्रज की कहाबत यानी कि सात दिन होने पर भी ब्रजवासियो के यहाँ नौ त्योहर होते है। इन्ही त्योहारों में प्रमुख है, गोपाष्टमी। गोपाष्टमी ब्रज संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है। गायों की रक्षा करने के कारण भगवान श्री कृष्ण जी का अतिप्रिय नाम श्गोविन्दश् पड़ा। कार्तिक, शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से सप्तमी तक गो-गोप-गोपियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। आठवें दिन इन्द्र अहंकार रहित होकर भगवान की शरण में आये।
कामधेनु ने श्रीकृष्ण का अभिषेक किया और उसी दिन से इनका नाम गोविन्द पड़ा। गौ के पालक होने की बजह से इनका गोपाल नाम भी पड़ा। भगवान ने अब छठे वर्ष में प्रवेश किया। एक दिन भगवान मैया से बोले ‘मैया…अब हम बड़े हो गये हैं। मैया ने कहा- अच्छा लाला…तुम बड़े हो गये तो बताओ क्या करे? भगवान ने कहा – मैया अब हम बछड़े नहीं चरायेगे, अब हम गाये चरायेगे। मैया ने कहा – ठीक है। बाबा से पूँछ लेना…झट से भगवान बाबा से पूंछने गये। बाबा ने कहा दृ लाला…, तुम अभी बहुत छोटे हो, अभी बछड़े ही चराओ। भगवान बोले- बाबा मै तो गाये ही चराऊँगा।
जब लाला नहीं माने तो बाबा ने कहा -ठीक है लाला,.. जाओ पंडित जी को बुला लाओ, वे गौ-चारण का मुहूर्त देखकर बता देगे। भगवान झट से पंडितजी के पास गए और बोले पंडितजी…. बाबा ने बुलाया है। गौचारण का मुहूर्त देखना है आप आज ही का मुहूर्त निकल दीजियेगा, यदि आप ऐसा करोगे तो मैं आप को बहुत सारा माखन दूँगा।
पंडितजी घर आ गए पंचाग खोल कर बार-बार अंगुलियों पर गिनते,.. बाबा ने पूँछा -पंडित जी क्या बात है? आप बार-बार क्या गिन रहे है ? पंडित जी ने कहा दृ क्या बताये,..नंदबाबाजी, केवल आज ही का मुहूर्त निकल रहा है इसके बाद तो एक वर्ष तक कोई मुहूर्त है ही नहीं। बाबा ने गौ चारण की स्वीकृति दे दी। भगवान जिस समय, जो काम करे, वही मुहूर्त बन जाता है। उसी दिन भगवान ने गौचारण शुरू किया वह शुभ दिन कार्तिक-माह का “गोपा-अष्टमी” का दिन था।
माता यशोदा जी ने लाला का श्रृंगार कर दिया और जैसे ही पैरों में जूतियाँ पहनाने लगी तो बाल कृष्ण ने मना कर दिया और कहने लगे मैया ! यदि मेरी गौ जूते नही पहनती तो मै कैसे पहन सकता हूँ। यदि पहना सकती हो तो सारी गौओं को जूतियाँ पहना दो।फिर मैं भी पहन लूंगा और भगवान जब तक वृंदावन में रहे कभी भगवान ने पैरों में जूतियाँ नहीं पहनी।
अब भगवान अपने सखाओं के साथ गौए चराते हुए वृन्दावन में जाते और अपने चरणों से वृन्दावन को अत्यंत पावन करते। यह वन गौओ के लिए हरी हरी घास से युक्त एवं रंग- बिरंगे पुष्पों की खान हो रहा था, आगे आगे गौएँ उनके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर तदन्तर बलराम और फिर श्रीकृष्ण के यश का गान करते हुए ग्वालबाल। इस प्रकार विहार करने के लिए उन्होंने उस वन में प्रवेश किया। और तब से भगवान गौ चारण लीला करने लगे।

कांधे लकुटधरी गोपाल चले बलदाऊ बालक आगे
रामकृष्ण सों प्रीत निरंतर सुख पायो बिन मांगे
पूरब संचित रास कब अपनी आँखन देखो
मो समान अब कोऊ नाहीं जन्म सुफल कर लेखों
खेलत हँसत पंथमें धावत लटकाई के बाहनी
ष्परमानंदष् भक्त हित माधव चार पदारथ दानी
कांधे लकुट धरी गोपाल ।पोंछत लाल गायनकी पीठ
कर मुखमुदित मुरि मुसक्यावन बारबार धारत तन दीठ
ले शिर मांट दुहावन आई बछरा दियें खिरकमें छोर !
धरहु धरहु तुम्हारे पाय लागहुं पियतन चिते हँसी मुख मोर
कछुक कान बलभद्र बीरकी धरहू जान न देनकी सेन
’परमानंद’ स्वामी रतिनायक दुहुं दिस झगरो लायो मेन
पोंछत लाल गायनकी पीठ
भोग श्रृंगार यशोदा मैया, श्री विट्ठलनाथ के हाथ को भावें।
नीके न्हवाय श्रृंगार करत हैं, आछी रुचि सों मोही पाग बंधावें
॥तातें सदा हों उहां ही रहत हो, तू दधि माखन दूध छिपावें।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल, निरख नयन त्रय ताप नसावें

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