सिद्ध श्रील कृष्णदास बाबा, मानसी गंगा, गोवर्धन तिरोभाव महोत्सव विशेष:

-मानसी गंगा की परिक्रमा कर निकाला सिद्ध बाबा का डोला, सूचक कीर्तन कर मनाया तिरोभाव महोत्सव

-ब्रज चौरासी कोस एवं विभिन्न देशों से आए गौड़ीय सन्तों एवं भक्तों का होता है समागम

वृन्दावन, गोवर्धन 24 सितम्बर 2017, (VT) सिद्ध श्रील कृष्णदास जी का जन्म उड़ीसा राज्य के जिला ‘मयूर-भंज’ के अंतर्गत ‘दामोदरपुर’ में हुआ। पिता जी का नाम सनातन एवं माता जी का नाम जरी देवी था। १६ वर्ष की अल्हड़ आयु में ही उत्कट वैराग्य ने गृह त्याग करा दिया । वृन्दावन आये, वृन्दावन से श्रीरूप गुसाँई पाद द्वारा प्रकट श्री राधागोविन्द देव का सान्निध्य पाने को जयपुर चले गये । वहाँ ८-१० वर्ष निवास किया, अनन्तर काम्यवन में सिद्ध श्रीजयकृष्णदास बाबा से भजन पद्धति की शिक्षा ग्रहण कर, नन्दगाँव निकटस्थ दोमिल वन में आपका प्रवास रहा । कठोर वैराग्य, आहार-निद्रा विस्मृत कर दिन-रात भजनस्थ ही रहते । अयुक्त आहार-विहार से आपकी नेत्र ज्योति मंद हो गयी ।

श्रीजी की कृपा हुई, श्रीजी ने ललिता जी को प्रेषित किया, ललिता जी एक सरल बालिका का रूप बनाकर स्वर्णथाल में भोजन लेकर गयीं, उस दिव्य भोजन से एक असामान्य पुष्टि की अनुभूति हुई, साथ ही दिव्य अञ्जन दिया, जिससे आपकी दृष्टि का पुनरागमन हुआ । इन सब दिव्य अनुभूतियों से बाबा को अनुभव हो गया कि वह कोई ग्रामीण बालिका नहीं थी, निश्चित ही अप्राकृत शक्ति थी । फिर तो बाबा को उसके पुनः दर्शन की तीव्र इच्छा हुई ।

तीन रात्रि व्यतीत हो गयीं उसकी प्रतीक्षा, अन्वेषण में, तब स्वयं श्रीजी स्वप्न में आईं, सान्त्वना दी, आदेश दिया – “कृष्णदास ! अब तुम श्री गोवर्धन चले जाओ, शेष जीवन वहीं व्यतीत करते हुए लोगों के लिए मेरी प्राप्ति का सहज मार्ग प्रशस्त करो ।” श्रीजी की आज्ञानुसार आप यहाँ श्री सनातन गुसाँई जी की भजन कुटी के निकट ही भजनरत हो गये ।

एक दिन बाबा हाथ में करुवा लेकर मानसी गंगा स्नान के लिए गए। वहां जुगल सरकार की जल केलि देख भावाविष्ट हो अगाध जल में कूद पड़े। जब बाबा कुटिया पर नहीं लौटे तो सभी सेवक चिंतित हो खोजने लगे। लेकिन बाबा नहीं मिले। ब्रज में नाना तरह की बातें होने लगी। सात दिन बाबा हाथ में करुवा लिए मानसी गंगा से बाहर निकले। लोगों ने पूछा -बाबा आप सात दिन तक कहां थे? बाबा बोले – मैं तो अभी स्नान करके निकल रहा हूं। इतनी सी देर में सात दिन कैसे बीत गए? तुम लोगों को कैसा भ्रम हो गया है ? बाबा दिन-रात लीलानुभूति में अभिभूत रहते । श्रीजी की कृपा से आपको स्वतः ही दिव्य ज्ञान हो गया । अनेकों वैष्णव ग्रन्थों का प्रणयन आपके द्वारा हुआ, जिनमें मुख्य है – प्रार्थनामृत तरंगिनी, साधनामृत चन्द्रिका, भावनासार संग्रह आदि, आपका जीवन मानव मनके लिए ज्ञान-विज्ञान प्रद एवं प्रेरणाप्रद है ।

बाबा निरंतर भजनावेश में रहते हुए भी जिज्ञासु वैष्णव को उसके अनुकूल उपदेश देकर उसे भजन के लिए उत्साहित करते। इस प्रकार एक दिन भजन करते हुए अपने नित्य मंजरी स्वरुप को प्राप्त करके निकुंज गमन किया।

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