एक समय वृन्दावन की हरियाली और घाटों की रमणीक श्रृंखला को देखकर रीझते थे ​देशी—विदेश पर्यटक

-मलबे में पटी है वृन्दावन की अद्भुत धरोहर, कितनी बड़ी कीमत चुकाई है वृन्दावन ने

{द्वारा: ब्रज संस्कृति शोध संस्थान, वृन्दावन}  
(VT) 30 Sep 2017, वृन्दावन में मन्दिरों के बाद सब से बड़े आकर्षण के केन्द्र थे यहाँ के कलात्मक घाट ! जिन्हें 18 वीं सदी में अत्यन्त भक्ति भाव से यमुना के तट पर निर्मित कराया था ,राजपूत ,जाट, मराठा , बुन्देला, होलकर आदि रजवाड़ों ने । धनिक व्यापारियों और जमींदारों ने भी कुछ घाटों को निर्मित कराया था ।
यह घाट इस लिए महत्वपूर्ण थे कि तीर्थ में स्नान का विशेष महात्म्य है, बिना यमुना स्नान के तीर्थ यात्रा पूर्ण कैसे होती ! इस लिए देश के विभिन्न राजे – रजवाड़ों ने बहुत सा धन व्यय कर वृन्दावन के यह शानदार घाट निर्मित कराये ।
वृन्दावन के मन्दिरों और घाटों ने भारतीय का ही नहीं, बल्कि कई विदेशी यात्रियों और चित्रकारों का मन मोह लिया था । सन् 1830 ई० के लगभग वृन्दावन आये एक विदेशी यात्री जैकेमांट ने यहाँ के लिए लिखा था – ’’यह बहुत ही प्राचीन शहर है और मथुरा से भी अधिक महत्वपूर्ण नगर कहा जा सकता है । हिन्दुओं के जितने बड़े पवित्र तीर्थ हैं उनमें से यह एक है । यहाँ के मन्दिरों में बड़ी संख्या में यात्री आते हैं और नदी के किनारे अत्यन्त रमणीक घाटों में पूजा करते हैं । सभी इमारतें लाल पत्थर की बनीं हैं , जो आगरा के पत्थर से उम्दा हैं। मैंने जितने हिन्दू शहर देखे हैं उनमें बनारस के बाद दूसरा नम्बर वृन्दावन का है । नगर के छोरों पर अच्छे पेड़ों के कुंज हैं , जो कुछ दूर से ऐसे लगते हैं मानो बलुए मैदान के बीच एक हरा-भरा द्वीप हो! पर आज कहाँ है इस वृन्दावन का सौंदर्य ! यमुना के घाटों का वह सुन्दर रूप !
मलबे के ढ़ेरों में दब गये वह कलात्मक घाट ! जो कभी पहचान हुआ करते थे इस नगर की ! हम ने क्या नहीं लिया इस नगर से ! और जरा सोचिए कि हमने क्या दिया है वृन्दावन को ! विचार करें कि कितनी बड़ी कीमत चुकाई है वृन्दावन ने हमारे तथाकथित विकास की ! पोस्ट में दिया गया यह चित्र वृन्दावन के श्रीमदनमोहन मन्दिर व यमुना के घाट का है जिसे सन् 1796 ई० के लगभग प्रसिद्ध अंग्रेज चित्रकार थॉमस डेनियल ने बनाया था । चित्र में दिख रही हरियाली अब पूरी तरह से गायब है और यह घाट भी मलबे में समा चुके हैं। DKS

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