मुहिम: अस्तित्व गंवाने की कगार पर पौराणिक प्रस्कंदन घाट एवं सूरज घाट

-मुहिम: *यमुना की विरासत, हमारी धरोहर*

– कालियामर्दन पश्चात् श्रीकृष्ण के शरीर से यमुना जल की बूदें गिरी, उसी स्थान को प्रस्कंदन घाट का नाम दिया गया था

– 12 सूर्य भगवान को गर्मी देने को पहुंचे, उसे द्वादशआदित्य टीला  कहते है।

 वृन्दावन, 25 अगस्त 2017,(VT) वृन्दावन की सबसे प्राचीन धरोहर एवं मंदिर मदनमोहन मंदिर हैं। मदन मोहन मंदिर बनावट एवं कलात्मकता  को देखकर श्रद्धालु एवं भक्त उसके मुरीद हो जाते हैं, मंदिर में बनी गगनचुम्बी छतरी वृन्दावन की प्राचीनता का दर्शन कराती हैं एवं श्रद्धालु एवं भक्तों का वृन्दावन में रहने का अहसास भी कराती है।

बात करें तो, पतित पावनी यमुना की जो हालत है उससे कहीं अधिक बदतर हालात हो चुके इसके प्राचीन घाट की। मदनमोहन मंदिर के ठीक नीचे जहां अविरल रूप से यमुना महारानी बिहार करती थी, उस पर बनी स्थापत्य कला की बेहतरीन निशानी प्रस्कंदन घाट स्थित था, जो कि सरकारी नुमाइंदों की अनदेखी एवं भूमाफियाओं की सक्रियता से उस घाट के आज अवशेष मिलना भी दूभर है। हमारी संस्कृति, हमारी धरोहर आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं और जमींदोज होने के कगार पर है।

वाराह पुराण के मुताबिक जिस समय ब्रजमंडल में अविरल बह रही यमुना में कालिया नाग ने अपना आशियाना बना लिया, जिसमें यमुना का जल विषैला हो गया। ब्रजवासी यमुना जल का प्रयोग भी नहीं कर पा रहे थे। तो भगवानश्रीकृष्ण ने यमुना शुद्धिकरण के लिए रची गई लीला कालियामर्दन किया था। इस दौरान भगवान जब काफी समय तक यमुना नदी के अंदर रहे तो उन्हें ठंड लग गई थी। भगवान की ठंडक दूर करने के लिए आसमान में जिस स्थान पर 12 सूर्य भगवान को गर्मी देने को पहुंचे उसे द्वादशआदित्य टीला कहा जाता है। इसकी भगवानश्रीकृष्ण ने स्वयं स्थापना कर तीर्थ का दर्जा दिया था इसी के साथ प्रस्कंदन घाट भी है। पुराण के अनुसार जिस समय भगवान कालियामर्दन करके यमुना से बाहर निकले और उनके शरीर से जो यमुना जल की बूदें गिरी, उस स्थान को प्रस्कंदन घाट का नाम दिया गया था। जो दिव्य तीर्थ के रूप में जाना जाने लगा। सूरजघाट का निर्माण मदनमोहन मंदिर के गोस्वामी समाज ने करवाया था।

द्वापर काल में वृन्दावन में जिन स्थानों पर अपनी लीलाओं के माध्यम से विश्व को संदेश दिए। यह पौराणिक महत्व वाले स्थान आज अपनी दुर्दशा पर आसूं बहाते नजर आ रहे है। यमुन किनारे स्थापित हुए घाट आज नजर नहीं आते। प्राचीन काल में जहां यमुना अविरल रूप से बहा करती थी। वहां आज बड़े-बड़े घर तथा काॅलोनियों बन चुकी है।  प्राचीन महत्व वाली इस धर्म नगरी में द्वापरकाल के कुछ ही अवशेष बचे है। इनके संरक्षण को न तो पुरातत्व विभाग न ही शासन स्तर पर कोई ठोस पहल की जा रही है। DKS

 

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