सावन के सोमवार पर विशेष: महारास लीला को देखने के लिए जब वृन्दावन में गोपी बने भोलेनाथ

-अद्भुत हैं वृन्दावन के कोतवाल गोपीश्वर महादेव
-नाम विदित गोपीश्वर जिनकौ, ते वृन्दा कानन कुतवार…
-वृन्दावन में गोपीरूप में आज भी दे रहे हैं दर्शन
-भगवान शिव का यह दुर्लभ स्वरूप वृन्दावन के अलावा दुनिया में कहीं नहीं

नाम विदित गोपीश्वर जिनकौ, ते वृन्दा कानन कुतवार…
-वृन्दावन में आज भी गोपीरूप में दे रहे हैं गोपीश्वर महादेव

वृन्दावन, 17.07.2017 (V.T.)गोपीश्वर महोदव की लीला भी निराली है। भगवान श्रीकृष्ण के महारास के दर्शन की लालसा में उन्हें गोपीरूप धारण करना पड़ा था। भोलेनाथ आज भी गोपीरूप में ही दर्शन दे रहे हैं। भगवान शिव का यह दुर्लभ स्वरूप वृन्दावन के अलावा दुनिया में कहीं नहीं मिलता।

श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि जब वंशीवट पर ब्रज गोपियों संग महारास के लिए श्रीकृष्ण ने वेणु-वादन आरंभ किया तो उसके स्वर को सुन भोलेनाथ भी प्रभु के रास-दर्शन करने वृन्दावन आ पहुंचे। मगर, सखियों ने उनहें रोकते हुए कहा कि महारास के दौरान वंशीवट में पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। रास में प्रवेश का अधिकार केवल गोपियों को हैं। यह सुनकर भोलेनाथ ने गोपी वेश धरा और महारास में प्रवेश कर गए।
भगवान श्रीकृष्ण तो अंतर्यामी थे, उन्हें पहचान गए और उन्हें गोपीश्वर का नाम दिया। आज भी वंशीवट के समीप भगवान भोलेनाथ गोपीरूप में भक्तों को दर्शन दे रहे हैं।

नाम विदित गोपीश्वर जिनकौ, ते वृन्दा कानन कुतवार…
-वृन्दावन में आज भी गोपीरूप में विराजमान गोपीश्वर महादेव

श्रीकृष्ण की इस पावन लीला के बाद उनके प्रपौत्र वज्रनाभ ने इन्हें खोजकर वंशीवट के समीप स्थापत किया।
यहां साधकों ने इन्हें इस पवित्र वन के कोतवाल की संज्ञा दी है, जिनके दरबार में हाजिरी के बिना ब्रजयात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती है, वृन्दावन के रसिक संत चाचा हित वृन्दावनदास ने भी लिखा है।
नाम विदित गोपीश्वर जिनकौ, ते वृन्दा कानन कुतवार…
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गोपीश्वर हर युग में प्रासंगिक

ब्रज संस्कृृति के अध्येता डा.राजेश शर्मा

वृन्दावन, ब्रज संस्कृृति के अध्येता डा.राजेश शर्मा बताते हैं कि ब्रज में वैष्णवों का शिव के साथ समन्वय अद्भुत है। महाप्रभु चैतन्य की परंपरा के अन्तर्गत रूप गोस्वामी ने 484 साल पहले संवत् 1589 में संस्कृत की रचना ‘विदग्ध माधव’ नाटक में गोपीश्वर महादेव के महत्व का उल्लेख किया।
वल्लभ कुल गोस्वामी विट्ठलनाथ जी की विसं. 1600 की ब्रजयात्रा में वंशीवट के समीप गोपीश्वर का उल्लेख है। सुकवि जगतानंद संवत् 624 में गुंसाई जी की दूसरी वनयात्रा के दौरान जहां ब्रज के आठ प्रसिद्ध महादेवों में गोपीश्वर का उल्लेख किया, वही उनकी ‘ब्रज ग्राम वर्णन’ रचना में भी इसकी जानकारी मिलती है। उन्होंने बताया कि राधावल्लभ संप्रदाय के चाचा हित वृन्दावन से वन का रक्षक गोपीश्वर को ही माना है। संवत् 1817 की रचना ‘हरि कला बेली’ में उन्होंने अब्दाली द्वारा किये गये हमले की दुहाई देते हुए वृन्दावन के रक्षक गोपीश्वर से प्रार्थना करने के साथ ही मथुरा के भूतेश्वर तथा गोवर्धन के चकलेश्वर का भी उल्लेख किया है।

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