मथुरा खुदत कटत वृंदावन अब सांचै ही कलियुग आयौ…..

वृन्दावन के प्रसिद्ध किशोरवन में व्याप्त हरियाली की अनुपम झांकी

वृन्दावन से बाग-बगीचों का खत्म होना जाना

वृन्दावन, 2017.05.27 (VT):  तुलसी के वनों से आच्छादित वृंदावन आज उजड़ रहा है। जहां का हर कोना कभी हरियाली अपने आप में हरियाली समेटे हुआ था, वहां अब हरियाली नहंी रही। आबादी बढ़ी, पश्चिमी सभ्यता को देखकर लोगों की सोच बदली और विकास ने यहां पैर पसार लिए, यहां के बाग-बगीचे बड़ी बेरहमी से उजाडे़ गए और धीरे-धीरे वृन्दावन कंक्रीट का बन रहा है। वृक्षों से रगड़कर गुजरती हवा की ठंडक अब खत्म हो गई। मोरों के कलरव-नृत्य व खगों की चहचहाहट अब यहां से गायब सी हो गई है। हरियाली के साथ-साथ यहां बने सरोवर, बाबड़ी, झील, कुण्ड, पोखरों पर भी कब्जे के शिकार हो गए।
वृंदावन के बारे में कहा जाता है कि वृंदावन सों वन नहीं, नंदगांव सों गांव। पर आज वृन्दावन में वन नहीं है। चारों तरफ विकास ही नजर आएगा और इस विकास की चकाचैंध में यहां नैसर्गिक खूबसूरती कहीं गायब सी हो गई है। बाग-बगीचों को खत्म कर हमने केवल पर्यावरण का ही नुकसान नहीं किया है, बल्कि अपनी संस्कृति को भी खत्म कर दिया है।
वृन्दावन के हर प्रमुख मंदिरों के अपने बाग-बगीचे थे, जिसमें बकायदा ठाकुरजी अपने भक्त परिकर के साथ अपने बगीचे में जाया करते थे, लेकिन धीरे-धीरे बाग-बगीचे सब विकास की भेंट चढ़ गए। आज बाजार की दृष्टि से वृन्दावन को फिर से वृन्दा का वन बनाने की बातें और थोड़ा बहुत कार्य भी हो रहा है, मगर यह हमारे परंपरागत उस पावन हरितिमा युक्त वृन्दावन  का स्थान नहीं ले सकती।
आज बाग-बगीचों के न होने का परिणाम यह हो गया है कि प्रकृति, पर्यावरण और समाज संकट में आ घिरे हैं। वृन्दावन में श्रीनिधिवन राज, सेवाकुंज, किशोर वन, टटिया स्थान, रंगजी मंदिर बगीचा आदि में ही अब बस पावन वृन्दावन  के दर्शन हो सकते हैं, बाकी पूरा वृंदावन सिर्फ नाम मात्र का  वृन्दावन रह गया है।
देखना यह है कि आने वाले समाज वृन्दावन को फिर से उसे उसका स्वरूप दिलवा पाता है या नहीं।
ब्रज के रसिक संतों में से एक हरित्रयी के संत श्री हरिराम व्यास जी ने आज से 500 वर्ष पूर्व ही वृन्दावन की आगामी स्थिति पर लिखा था कि मथुरा खुदत कटत वृन्दावन अब सांचै ही कलियुग आयौ, पूत कह्यो ना बाप को मानत, बेटिन को दिन-दिन मोल बढ़ायौ….।

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