वृन्दावन का पौराणिक स्वरुप

वृन्दावन टुडे 2014,08,16 गोपाल शरण शर्मा
समस्त धामों का सिरमौर परमपावन श्रीधाम वृन्दावन है। इस भूमण्डल पर यह अपने अखण्ड रसमय स्वरूप में विद्यमान है। जिसने वृन्दावन का आश्रय ग्रहण नहीं किया वह मनुष्य अभागा है –
तिनको दरस देश दुर्लभ जे आराधत राधाहिं।
भूवसि वृन्दावन नहिं सेवत ते प्रानी पछिताहिं।।
(स्वामी श्री विहारिनदेव जी)
व्रजमण्डल के अन्तर्गत हैं- गिरिराज गोवर्धन, गोकुल, रावल, नन्द गाँव, बरसाना और वृन्दावन। वृन्दा-भक्ति, अवनं़¬¬- रक्षणं यानि भक्ति के द्वारा ही जिसकी रक्षा है, जहाँ पर समस्त प्राणी श्री राधा कृष्ण की माधुर्यरस से परिपूर्ण भक्ति रस का पान करके जीवित रहते हैं , उसे वृन्दावन कहते हंै। श्याम सुन्दर की आत्मा राधिका हैं और राधिका की आत्मा श्याम सुन्दर है , दोनांे परस्पर विहार करते हैं। यह विहार नित्य है कभी विरत नहीं होता। यमुना,के सम्बन्ध में जनश्रुति है – यम ना अर्थात् अपने भक्तो के सारे पापों का विनाश करके प्रेमा भक्ति प्रदान करने वाली है।

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श्री कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा है और लीला स्थली वृन्दावन है। इसलिए वृन्दावन का अधिक महत्त्व है। प्रेम -दीवानी मीरा भी वृन्दावन के आकर्षण से स्वयं को मुक्त न रख सकीं । वे कहती हैं-‘‘माई म्हाने लागे वृनवन नीको।’’ वृन्दा का अर्थ तुलसी ही यह तुलसी का वन होने से तो वृन्दावन है ही महारानी राधा का यह क्रीडा कानन (वन) भी है।

ब्रह्मवैपर्तपुराण पद्म पुराण में श्री श्रीमöागवतमहात्म्य में श्रीनारदजीने भक्ति को वृन्दावन का महात्म्य बताते हुए कहा है-
‘वृन्दावनस्य संयोगात्पुनस्त्वं तरुणी नवा।
धन्यं वृन्दावनं तेन भक्तिर्नृत्यति यत्र च।।’’
वृन्दावन के संयोगसे आप तरुणी हो गयी हो । अतः यह वृन्दावन धाम धन्य है, जहाँ भक्ति सर्वत्र नृत्य कर रही है।
भद्रवन, श्री(वेल) वन, लोह वन, काम्य वन, कुमुदवन, मधुवन और वृन्दावन -ये व्रजमण्डन के बारह वन हैं। इन वनों में अतिगुह्य और उत्तम वन वृन्दावन है (वृहन्नारदीय पुराण ७९/१७) । इन वनों की संख्या बारह एवं उपवन बत्तीस इस प्रकार चवालीस वन बताये गये हैं। यमुना से आवृत्त है यह वृदावन। ब्रह्मादि देवगण इस वृन्दावन का सेवन करते हैं । योगिजन जहाँ ध्यान में निरत रहते हैं। कोयल मधुर स्वर से वातावरण में रस घोलती है। सुन्दर कपोत जहाँ आनन्द ले रहे हैं। मोर नृत्य कर रहे हैं, पुष्प खिले हुए है। बाँसुरी बज रही है। शीतल मन्द बयार बह रही है। जहाँ न प्राकृतिक दुःख है और न सुख। जरा है और न मृत्यु है , क्रोध भी नहीं है -ऐसा है यह वृन्दावन। नित्य किशोरवेश सर्वेश्वर श्रीकृष्ण का यह वृन्दावन अष्टकोणनिर्मित योगपीठ है। मथुरा मण्डल में श्री वृन्दावन पाँच सौ योजन फैला हुआ है। सारे जीवन कुछ कैसा भी साधन भजन न हो पर अन्तिम समय वृन्दावन की रज में देहत्याग हो जाये तो उस मनुष्य को परम पद की प्राप्ति होती है।
अपने परमधाम गोलोक में ब्रजमण्डल के अन्तर्गत विद्यमान बृन्दावन को श्रीकृष्ण के रूप में सखीवृन्द परिकर सहित अवतरित होकर इस धरती पर प्रकट किया-
‘‘व्रज समुद्र मथुरा कमल वृन्दावन मकरन्द।
व्रजवनिता सब पुष्प हैं , मधुकर श्री ब्रजचन्द्र।।’’

भगवान् कहते है -‘‘वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छामि ’’ अर्थात् इस वृन्दावन की सीमा का परित्याग कर एक चरण भी आगे नहीं करता । इतना प्रिय है यह वृन्दावन भगवान् को। वेद इस वृन्दावन की प्रशंसा करते नही थकते-images vrindavan1
‘‘तं वां वास्तुन्युश्नसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृंगा अयासः।
अत्राह तदरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि।।’’
ऋग्वेद , द्वितीय अष्टक , विष्णु सूक्त
वेद पुराण एवं तन्त्र शास्त्र में वृन्दावन का महत्त्व बताया गया है।
‘‘सात्वतां स्थानमूर्धन्यं विष्णोरत्यन्तदुर्लभम्।
नित्यं वृन्दावनं नाम ब्रह्माण्डोपरि संस्थितम्।।
पूर्णं ब्रह्मसुखेैश्वर्यं नित्यमानन्दमव्ययम्।
वैकुण्ठादि तदंशाशं नित्यं वृन्दावनाश्रयम्।।
कृष्णधाम परं तेषां वनमध्ये विशेषतः।’’
जिस वृन्दावन को इन चर्मचक्षुओं से देख नही जा सकता योगी ध्यानावस्था में जिसका दर्शन कर सकते हैं । कहने का तात्पर्य यह है योगियों के लिए भी परम दुर्लभ वैकुण्ठ गोलोक धाम जिसमें वृन्दावन है। अपने परमधाम गोलोक में ब्रजमण्डल के अन्तर्गत विद्यमान बृन्दावन को श्रीकृष्ण के रूप में सखीवृन्द परिकर सहित अवतरित होकर इस धरती पर प्रकट किया।

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